Sunday, 7 December 2025

एक संगिनी

एक संगिनी


तुम्हारा मिलना 
जीवन को एक नई आस देता है,
घोर अंधेरे में
विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है।

तुम तब आई
जब युद्ध मैं हार चुका था,
निराशा की बदली में 
सुनहरे सपने सब मार चुका था।

तुम उम्मीद की
एक किरण बनकर आई,
झंझावातों के सिंह में 
तुम स्वर्ण एक हिरण बन आई।

तुम आई 
वैसे जैसे मेरी कल्पनाएं थीं,
तुम ठहरना
वैसे जैसे ढेरों मुझमें कामनाएं थीं।

:- संदीप प्रजापति 

( कभी - कभी ईश्वर आपको वो दे देता है, जिसकी आपने कामना भी न की हो। ऐसे में उसे धन्यवाद कहना स्वाभाविक होना चाहिए।)


एक संगिनी

एक संगिनी तुम्हारा मिलना  जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...