Friday, 10 December 2021

शिक्षा: मजदूर की आँखों का सपना

                 शिक्षा: मजदूर की आँखों का सपना

     एक बालक मात्र १२-१३ की उम्र में बड़े शहरों का रुख करने लगा था। अभी बचपना छूटा ही न था, खेलकूद से मन भरा ही न था कि जिम्मेदारियों का बोझा सिर आ चुका था। साँवला रंग और ढीली-ढाली कद काठी का वह बालक लेकिन ईमानदारी, मेहनती और सच्चाई के गुणों को जानने वाला। निकल पड़ा था अपने गाँव-घर और माँ-बाप से दूर शहरों की ओर मजदूरी दिहाड़ी की तलाश में। जहाँ दो जून का खाना मिलता दो पैसे मिलते वहीं रह लेता मजदूरी कर लेता। कोई ढंग का काम तो मिलने से रहा, शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता जो न था। इच्छा तो थी शिक्षा पाने की परन्तु आर्थिक हालात ऐसे न थे कि वो शिक्षा पा सके। इसीलिए काम करता और जो पाता उसी में खुश रहता।
       वह कुछ वयस्क हुआ ही था कि उसका ब्याह हो गया। अब सिर पर और एक जिम्मेदारी आ गयी थी। जिम्मेदारी क्या मानो बोझ। खुद के पेट पाले नहीं पल रहे थे कि अब घर गृहस्थी भी बसाना पड़ा। देखते ही देखते अब पुत्र रूप में एक और जिम्मेदारी आ गयी थी। परंतु अब तक वह इतना साहसी तो हो चुका था कि सारी जिम्मेदारियों को निर्भीकता से उठा ले। कुछ समय बिता आर्थिक तंगी अब भी वैसी ही बनी थी परंतु अब पारिवारिक कलह भी होने लगा। मजबूरन अपना परिवार लेकर उसे माँ-पिता से अलग हमेशा के लिए किसी अनजान शहर के एक छोटी-सी झुग्गी-झोपड़ी में बसना पड़ा। जीवन की एक बिल्कुल शुरू से नई शुरुआत हुई। जस-तस गुजर बसर होने लगा। कई मौसम बदले,बरस बदलते गए अब वह तीन संतानों का पिता हो चुका था। परंतु आर्थिक तंगी बरकरार ही थी। शिक्षित न होने का मलाल जीवन भर उसे ज्यों-त्यों सताता रहता था। इसी कारण उसने अब प्रण ले लिया था कि उसे चाहे जीवन भर दुख झेलना पड़े। चाहे जो हो जाए वह अपनी संतानों को जरूर शिक्षित  करेगा। वह उन्हें पढ़ा-लिखा कर एक प्रतिष्ठित व सम्मानजनक व्यक्तित्व वाला जीवन प्रदान करेगा। यह दृढ़ संकल्प सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि उसकी पत्नी का भी था। क्योंकि वो भी धेला बराबर भी शिक्षित न थी परंतु गृहस्थी में निपुड थी और शिक्षा का महत्त्व भलीभाँति जानती थी।
               दोनों जी तोड़ अथाह मेहनत करते और उसी से अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण करते। जिंदगी की मूलभूत जरूरतों में कटौती कर अपना पेट काट-काट कर दोनों अपनी संतानों को खूब पढ़ाने का सपना संजोते। उन्होंने कुछ रो-धोकर तो कुछ सिफारिशों के सहारे अपने बच्चों को स्कूल में भर्ती तो करा दिया। पर आए दिन पढ़ाई के खर्चे और  स्कूल के शुल्क अदा कर पाना उनके बस की बात न हो पा रही थी। नतीजतन दाखला रद्द होने की नौकत तक आ गयी। न चाहते हुए भी कर्जा लदकर  बच्चों की पढ़ाई जारी रखी गई। हालाँकि बच्चे भी पढ़ाई-लिखाई में होनहार ही थे। अभावों के चलते बस जीवन के दूसरे आयामों में थोड़ा पीछे थे। मगर शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर था। आए दिन कक्षा में उनका हुनर बोलता था। शिक्षक काफी प्रभावित थे उनकी प्रतिभा से। मगर नियति पग-पग पर इनकी परीक्षा लेती और इन्हें जीवन पथ पर मजबूती से डटे रहने का सबक सिखाती।
                      वक्त के साथ-साथ दोनों दंपति उम्र दराज होते गए। मजदूरी अब किए नहीं जा रही। घरवाली अलग बीमार रहती। घर चलाना मुश्किल होता जा रहा था। परंतु व्यक्ति ने इस पल भी हार न मानी और अपना सपना जीवित रखा। किसी भी परिस्थिति में अपनी संतानों की शिक्षा को बाधित न होने दिया। चूँकि अब सन्तानें भी इतनी बड़ी हो चुकी थीं कि अपनी आर्थिक स्तिथि को समझ सकें और अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा सकें। परिणामस्वरूप उन बच्चों ने भी कुछ काम करना शुरू कर दिया और साथ ही साथ अपने पिता के सपने को भी जीवित रखा। पैसे कमाने में हाथ बंटाने के साथ साथ वे अपनी पढ़ाई को भी बखूबी जारी रखते और इतना ही नहीं सभी शैक्षणिक मापदण्डों में अव्वल ही रहते। जिससे बूढ़े दम्पत्ति को सांत्वना मिलती की ईश्वर एक न एक दिन उनकी मेहनत का फल जरूर देंगे और उनका सपना भी साकार होगा।
              यह कहानी किसी सफल व्यक्तित्व या किसी  व्यक्ति की असाधरण सफलता की नहीं है बल्कि यह कहानी हमारे देश के सबसे पिछड़े तबके के ऐसे हजारों-लाखों गरीब-मजदूर लोगों के संघर्ष की कहानी है। जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य केवल अपनी संतानों को शिक्षित कर देना ही होता है। वे इसमें ही अपने जीवन की सार्थकता को मानते हैं। और बस इसी एक संकल्प के लिए अपनी परंपरागत लीक से हटकर कुछ सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए जीवन भर जीवनभर संघर्ष करते हैं। हालाँकि उनके सपनों का सच होना न होना यह तो ईश्वर के हाथों ही है। परंतु ऐसे महान विचारधारा वाले हर उस व्यक्ति को मेरा सहृदय नमन है। ईश्वर से प्रार्थना है कि किसी ऐसे ही सपने को पूरा करने का भागीदारी मैं बन सकूँ।

Friday, 3 December 2021

मित्र : एक सीख

मित्र : एक सीख

                  "हर सुखी नवविवाहित जोड़े में एक ऐसा तीसरा व्यक्ति भी होता है, जो बेवजह नियती के हाथों का मोहरा बनता है और उसके मृदु हृदय में प्रेम के बदले केवल रह जाती हैं स्मृतियाँ।"
                          जी हाँ आज मैं आपको एक ऐसी ही कहानी बताने जा रहा हूँ जिसमें एक ओर केवल मासूमियत और प्रेम था तो दूसरी ओर केवल छल और उपयोगिता।
                  तो चलिए शुरू करते हैं, तकरीबन पाँच-सात साल पहले की बात है। जब मैं, मेरा घनिष्ठ मित्र और उसकी तथाकथित प्रेमिका हमसब कक्षा नौं या दस में पढ़ते थे। उस वक्त हमारी उम्र लगभग कोई १४-१५ बरस की रही होगी, कोरा बचपन जिसमें केवल उल्हास और उमंग था। मेरा मित्र जो कि कक्षा का सबसे होनहार, शालीन और सर्वश्रेष्ठ दर्जे का विद्यार्थी था। सारे शिक्षक और हमसब सहपाठी उससे काफी प्रभावित थे। एक अच्छा विद्यालयीन माहौल था हम सब में। खेलकूद और पढ़ाई-लिखाई ही जीवन था। इससे अधिक तो हम जानते ही न थे। हालाँकि शायद उसी दौरान हमारी कक्षा में एक नई लड़की का भी प्रेवश हुआ था। उसके परिचय के बारे में कहूँ तो गजब की कद काठी और अलौकिक सुंदरता की धनी थी वो लड़की। वक्त बीतता गया और वह भी हम सब के साथ खूब घूलमिल गई। पर न जाने कहाँ से उस छोटी सी उम्र में ही मेरे मित्र के मन में प्रेम का वास हो गया। उसे वह लड़की खूब भाने लगी। भीतर ही भीतर वह उससे अथाह प्रेम करने लगा। और एक रोज उसने  अपने प्रेम का इजहार उस लड़की के सामने कर ही दिया। परंतु शायद कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिली और ये एक तरफा प्रेम ही चलता रहा।सच कहूँ तो उसका एक तरफा प्रेम कभी दो तरफा हो ही न पाया। बस मित्रता की आड़ में केवल उपयोगिता ही निभाई गई।
                         पर वह इस एक तरफा प्रेम में ही खुश था क्योंकि इसी बहाने वह उसकी मित्र तो थी। इसी निश्छल और मासूम प्रेम के वसीभूत होकर वह उस लड़की के लिए कुछ भी कर बैठता था। कभी कक्षा के उपद्रवी बच्चों से उसकी खातिर लड़ जाता तो कभी उसकी उत्तर पुस्तिकाएँ खुद ही जाँच लेता था। कभी परीक्षा केंद्र में उसकी परीक्षाएँ भी खुद ही लिख देता ताकि वह उत्तीर्ण हो सके। इन सबके लिए हम सारे दोस्त उसका खूब उपहास करते उसकी हँसी उड़ाते। कभी-कभी उसे सलाह भी देतें की यह सब मत कर वह लड़की केवल तेरा इस्तेमाल कर रही है। पर हम सब तो ठहरे मूर्ख हमारे भीतर तो कभी प्रेम का वास ही न हुआ तो हम ये कैसे जानते कि प्रेम में व्यक्ति खुद के बारे में नहीं सोच सकता। मेरा वह मित्र हमारे सारे अपमानों को सह जाता और प्रेम पथ पर अड़िग रहता। धीरे-धीरे हमारी दसवीं की परीक्षाएँ नजदीक आ गयीं। मेरा होनहार मित्र अपनी पढ़ाई को दरकिनार कर दिन-दिन भर सिर्फ उस लड़की को पढ़ाता रहता ताकि वो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो सके। अंततः परीक्षाएँ हुई और परिणाम भी आ गए। वह लड़की तो  अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गई। परंतु मेरा मित्र अपने और हमारे विद्यालय के उम्मीदों पर खरा न उतर सका। उसके अंक कम हो गए और वह पहले जिस तरह कक्षा में प्रथम आता था इस बार प्रथम न आ सका। अध्यापक और हम सब मित्र तो उससे नाराज थे। परंतु वह अपने से खूब खुश था क्योंकि वह जानता था कि उसकी मेहनत सफल हुई है। उसकी प्रेमिका अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुई है।
                    विद्यालयीन दौर खत्म हुआ हम सब ने महाविद्यालयों में प्रवेश किया। मेरे और उस लड़की के विषय एक ही होने के कारण हमारी कक्षाएँ भी फिर एक बार एक ही थीं। परंतु मेरे मित्र की शाखा अलग होने के कारण वह हमसे अलग था। मतलब मेरे मित्र के लिए इस समय केवल मैं ही उसके और उसके तथाकथित प्रेमिका के बीच जरिया था। उसने पुनः चाहा कि वह किसी तरह उससे प्रेम पा सके। हालाँकि  अभी तक उस लड़की ने न ही प्रेम प्रस्ताव की स्वीकृति ही कि थी और न ही नकारा था। केवल मित्रता के नाम पर स्वार्थसिद्धि करवाती रही। इन सभी ऊहापोह में मेरे मित्र की शैक्षणिक योग्यता खराब होती गई। वह निरंतर हर कक्षाओं में अनुत्तीर्ण होता रहा। किसी कारणवश एक रोज उन दोनों में किसी बात को लेकर अनबन हो गई जो बढ़ती ही जा रही थी। अतः सुलह और समझौते के तौर पर मुझे भी इस बीच में जाना पड़ा। उसी दौरान उस लड़की ने बड़ी ही अभद्रता और अपमानजनक शब्दों में कहा कि उसे मेरे उस मित्र से किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं रखना। न मित्रता न ही कुछ और। और यह सब सुन हम दोनों मैं और मेरा मित्र हक्के-बक्के रह गए। हालाँकि उसके बाद मेरे मित्र की शैक्षणिक योग्यता और अधिक खराब होती गई। उसने पढ़ाई ही छोड़ देने का निश्चय ले लिया। परंतु एक बात थी उसने कभी गलत रास्ता नहीं चुना, खुदको अवसाद का शिकार नहीं होने दिया। कुछ समय बाद उसने स्वास्थ्य और व्यायाम के क्षेत्र की ओर रुख किया। अपने अंदर कौशल विकसित किया। साल दर साल खूब मेहनत की और आज वह एक अच्छे प्रशिक्षित स्वास्थ्य सलाहकार के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा है। और हम सब मित्रों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण के तौर पर है।
              यह कहानी बताने का मेरा सिर्फ यह उद्देश्य था कि कभी-कभी हम हमारे आसपास की जिन चीजों और घटनाओँ को मामूली समझते हैं। उनका हमारे जीवन पर बेहद महत्वपूर्ण असर होता है। ये सारी घटनाएँ हमें बहुत कुछ अमूल्य बातें सीखा जाती हैं। जैसे कि मैंने अपने इस मित्र से बहुत कुछ सीखा।

१) जब आप विद्यार्थी हो तो आप केवल विद्यार्थी हो। अपना सर्वश्रेष्ठ शिक्षा को ही दो।
२) जब आप प्रेमी हो तो आप केवल प्रेमी हो। अपना सारा प्रेम निःस्वार्थ भाव से लूटा दो।
३) अंतिम एवं सबसे मुख्य जब भी जीवन में किसी भी क्षेत्र में असफलता हाथ लगे तो उससे अपने आप को बरबाद न कर बैठें बल्कि एक सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह के साथ जीवन को एक नई दिशा दें। एक नई शुरुआत करें।

                  और हाँ, इस पूरे चार-पाँच साल की प्रेमकहानी में मुझे व्यक्तिगत तौर पर जो बात सबसे ज्यादा भाती है, वो यह है कि मेरा वह मित्र इतना ज्यादा नैतिकतावादी था कि कभी उसने उस लड़की को न ही बुरी नजर से देखा और न ही कभी छुआ। जबकि उसके पास कई बार ऐसे मौके आए थे कि वह उसके साथ सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सके। और हाँ कई बार तो कई मित्रों ने उसे सलाह तक दे दिया था कि तू भी उसका इस्तेमाल कर ले। पर वो तो ठहरा प्रेमी। उसने अपनी प्रेमिका का सम्मान और अपने प्रेम की गरिमा बनाए रखी।
                     कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या उस मित्र की जगह मैं होता तो क्या मैं भी ऐसा कर पाता। शायद नहीं...और यही चीज हमेशा कचोटती है कि उस छोटी सी उम्र में ही जीवन का एक अटल सत्य और अनमोल गुण मेरे मित्र ने मुझसे पहले ही सिख लिया था। हालाँकि हम सारे दोस्त अभी संघर्षों के दौर में ही हैं। पर वह लड़की हाल के ही कुछ समय में एक सुव्यवस्थित युवक से विवाह कर सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही है।




(लेख काफी बड़ा हो जाने के कारण बहुत कुछ बातें,यादें और किस्से अलिखित ही रह गए हैं, परंतु मैं जानता हूँ कि आप सब एक प्रेमी की भावनाओं का बखूबी समझेंगे। आशा करता हूँ कि कहानी अच्छी लगी होगी और हम सब में एक सकारात्मक ऊर्जा प्रेरित करेगी। गोपनीयता और निजता के कारण किसी का व्यक्तिगत परिचय नहीं दिया गया है।)

            

Thursday, 2 December 2021

परिवार से अलग एक पुरुष

                    परिवार से अलग एक पुरुष

                           अकेले रहना कष्टदायी तो होता है, खास कर उन पुरुषों के लिए जो किसी कारणवश अपने परिवार से अलग हैं। पर यही अकेलापन इन पुरुषों को आगामी जीवन के लिए तैयार करता है। जो इन्हें एक आदर्श पुरुष बनाता है। मेरे ख्याल में अकेले रहने में कोई हीन भावना नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह अकेलेपन का दौर ही मनुष्य को उसके जीवन के सारे बहुमूल्य सबक सिखाता है और परिपक्व, आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी एवं कर्मठ बनाता है। इस प्रकार के पुरूष कच्ची उम्र से ही जीवन के गूढ़ रहस्य को समझने लगते हैं और वास्तविकता में जीते हैं न कि ढोंग और चमक दमक में।
                       खुद ही खुद से प्रेम करना, सारी दुख तकलीफों में खुद को खुद से सम्भाल लेना, कभी जी भर रो लेना तो कभी बेवजह मुस्कुरा देना। एक आदर्श जीवन के ऐसे कई गुण इन पुरुषों में स्वाभाविक तौर से विकसित हो जाते हैं। पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और न जाने कई परेशानियों को झेलते हुए भी ये लोग जीवन को सुचारू ढंग से चलाते हैं और जीवन की जीवटता को मिटने नहीं देते। इस प्रकार का अकेलापन एक पुरुष हो उसके वास्तविक में पुरुष होने का बोध कराता है और उसे उसके दायित्वों का निर्वहन करने की क्षमता प्रदान करता है।
           "और हाँ एक अंतिम परन्तु मुख्य बात की ऐसे पुरुषों को पेट की भूख  के लिए कभी किसी स्त्री पर निर्भर नहीं होना पड़ता।"


(अपने परिवार से अलग, माँ-बहन, प्रेमिका-पत्नी से दूर रह रहे सभी मित्र भाइयों को समर्पित एक छोटा सा लेख। आशा करता हूँ कि भावनाएं आपके दिल तक जरूर पहुचेंगी।)

Friday, 26 November 2021

घरवाली


                              घरवाली

काजल बिंदी व कानों में 
एक सूंदर सी बाली होगी...
फटे चीथड़ों के इस दौर में 
सूट सलवार दुपट्टे वाली होगी...
छल कपट चालाकी से परे
सूंदर सुशील भोली भाली होगी...
सबसे न्यारी सबसे प्यारी
उसकी हर एक बात निराली होगी...
मन के सूखे में प्रेम बरसेगा
एक वो ही तो बरसाने वाली होगी...
दोस्त प्रेमिका जीवनसाथी
सब कुछ तो वो घरवाली होगी...
यूँ ही नहीं उसमें पगलाता हूँ
वो तो अप्सरा एक खयाली होगी...
प्रतिक्षाओं का अंत होगा प्रेम अनंत होगा
जब इन होंठों पे उसके होंठों की लाली होगी...
                                        
                                                 :- संदीप प्रजापती

(प्रेम की प्रतीक्षा में अपने प्रेमी के रंग-रूप, हाव-भाव की कल्पना करते हुए अपने चित्त में उसका एक सजीव चित्रण कर लेना और बस उसी चित्र को अपने ऑंखों के सामने हर घड़ी देखना भी एक बेहद ही सुखद अनुभव है।)

Friday, 19 November 2021

हम छात्र हैं...


हम छात्र हैं...

हम छात्र हैं,
दया के पात्र हैं।

सम्मान हमें मिलता नहीं,
दर्द इतना की संभलता नहीं।

हर किसी का प्रभाव हम पर है,
पैसों का अभाव हम पर है।

खाली जेब औक़ात दिखाती है,
अरे भाई उम्र भी तो ढली जाती है।

कभी घर की परेशानियों से
तो कभी समाज के तानों से,
हम हार जाते हैं
अपने ही अरमानों से।

कई रातें जागी है, जवानी खपाई है,
आंखें किताबों में गड़ाई है।
फिर भी असफल हुए तो हम नाकारा है,
सफलता की हमने काबिलियत ही नहीं पाई है।

थक जो जाएं किताबों पर सिर रख सोते हैं,
एक सपना जीने को रोज थोड़ा थोड़ा रोते हैं।
बस इस साल मेहनत करलो फिर तो मौज है,
हर रोज यही सुनते सुनते जिंदगी बन गई बोझ है।

छात्र एक परिंदा होगा,
कहीं मुर्दा तो कहीं जिंदा होगा।
न किसी का साथ होगा न कोई कंधा होगा,
हम होंगे हमारा पंखा होगा और गले में फंदा होगा।

परीक्षाएँ तो होंगी मगर छात्र न होंगे,
दया तो होगी मगर दया के ये पात्र न होंगे।

                                                     :- संदीप प्रजापति


(दुनिया की इस पाठशाला में मनुष्य जीवन भर छात्र बना रहता है। मेरी यह कविता छात्र जीवन जी रहे हर उस युवा को समर्पित है, जो सारी जिम्मेदारियों को उठाते हुए भी अपने अंदर के विद्यार्थी को मरने नहीं देता है। अपने किसी विशेष लक्ष्य के लिए पढ़ता रहता है। लोगों की अवहेलना सहता है फिर भी अपने काम में लगा रहता है और फिर एक दिन सफल होकर भी दिखाता है।)


Wednesday, 17 November 2021

एक तलाश जारी है...

एक  तलाश जारी है...

ये तुम हो
या मेरे ख्वाबों ने
तुम्हारी तस्वीर उतारी है।

वो मासूम चेहरा
गोरे गाल
और आँखें भी तो कजरारी है।

वो सादगी  मिजाज
गुलाबी होंठ
और बोली भी तो न्यारी  है।

वो अल्हड़ जवानी
गठीला बदन
और चाल भी तो मतवारी है।

वो पतली कमर
ऊँचा कद
और मोहोब्बत भी तो करारी है।

वो चांदनी सुंदरता
बेदाग चरित्र
और पवित्रता भी तो सारी की सारी है।

सच कहना तुम ऐसी ही हो या,
मेरी कल्पनाओं में एक तलाश जारी है।

                                                 :- संदीप प्रजापति


(अपनी कल्पनाओं में प्रेम का एक चेहरा बुनना और उसी से अथाह प्रेम करना भी एक आनन्द है। प्रेम करने के लिए आपके पास किसी के एक वास्तविक शरीर का होना ही आवश्यक नहीं है। आप किसी स्थान, वस्तु, विचारों या स्मृतियों से भी भरपूर प्रेम कर सकते हैं जो आपको ईश्वरीय प्रेम का अनुभाव कराता रहेगा।)








Tuesday, 16 November 2021

एक सवाल

                                 एक सवाल


एक सवाल है
जवाब बताओगी क्या...

बंदिशें कितनी ही हो
तुम दौड़ी चली आओगी क्या...
रूठूँ जो कभी तुमसे
तुम प्यार से मनाओगी क्या...

थक जो मैं जाऊँ
सिर गोदी में रखकर सुलाओगी क्या...
प्रेम जितना हो तुममे
सारा प्रेम मुझपर लुटाओगी क्या...

आज ख्वाबों में आई हो
कल बाहों में भी आओगी क्या...
तुम्हारी इन हथेलियों पर
मेहँदी हमारी रचाओगी क्या...

मांग में अपनी 
हमारा सिंदूर सजाओगी क्या...
फेरे पूरे सात लेकर
सात जन्मों का साथ निभाओगी क्या...

मैं जीवन भर इंतज़ार कर लूँ
बस एक बार कह दो तुम आओगी क्या...
सुनो इस बंजर मन में
प्रेम का उपवन लगा के छोड़ जाओगी क्या...

                                                  :- संदीप प्रजापति

(मन मे कुछ आशंकाएं लिए कल्पनाओं की दुनिया में प्रेम का बसेरा ढूंढ रहा एक प्रेमी। प्रेम पा लूँ या प्रेम जी लूँ बस इसी द्वंद्व में उलझा हुआ है। ) 



Saturday, 30 October 2021

याद

                     याद

वो पहला स्पर्श याद आया होगा,
वो पहला निष्कर्ष याद आया होगा।
वो पहली बरसात याद आयी होगी,
वो पहली मुलाकात याद आयी होगी।
वो पहला चुम्बन याद आया होगा,
वो पहला क्रंदन याद आया होगा।
वो पहली दफा राहों में आना याद आया होगा,
वो पहली दफा बांहों में आना याद आया होगा।
वो पहले यार का याराना याद आया होगा,
वो पहले प्यार का खजाना याद आया होगा।
लाखों होंगे उसके चाहने वाले अब भी,
फिर भी उसे गुजरा जमाना याद आया होगा।
जब भी वो किसी नए आशिक़ से मिलती होगी,
बस वही आशिक़ पुराना याद आया होगा।

                                                       :- संदीप प्रजापति

(प्रेम में पूर्णतः समाहित एक व्यक्ति हमेशा इसी कल्पना में रहता है कि शायद उसके प्रेमी ने जीवन में एक न एक बार तो किसी न किसी अवसर पर उसे याद तो जरूर किया होगा या किसी घटना ने उसे उसकी याद दिला दी होगी और कुछ भूली बिसरी स्मृतियों ने उसके भी हृदय को गुदगुदाया होगा। वो एक ही आश में रहता है कि हम दोनों एक ही दुनिया में है, जीवन के किसी न किसी छोर पर भेंट तो होगी ही फिर पूछूंगा कभी मेरी याद आयी थी?)


Thursday, 28 October 2021

प्यार में लड़के

                           प्यार में लड़के



            लड़कियों तुमको भी किसी लड़के से प्यार तो हुआ ही होगा। पर क्या तुमको कभी किसी लड़के के शर्ट से,पैंट से,घड़ी से,बालों से या उससे जुडी किसी भी चीज से कभी प्यार हुआ है?
नहीं न।
हम लड़को को हुआ है।
       तुमसे भी हुआ है और तुम्हारी हर उस चीज़ से हुआ है जो तुमसे होकर गुजरती हो। तुम्हारे कपड़ों से लेकर जूते ,चप्पलों को भी हम लड़के इतनी बारीकी से प्यार कर जाते हैं जैसे उसमें भी तुम ही समाई हो। तुम्हारे इश्क़ को पाने में तुमसे जुड़ी हर उस चीज़ से इश्क़ कर बैठते हैं, जिसका लड़कों के जीवन में कभी कोई महत्त्व ही न हो। पर क्या करें एक तुमको रिझाने में ये सब भी करना पड़ता है। कभी तुम्हारे टूटे बालों को ही सहेज लेना तो कभी तुम्हारे होंठो की लाली का रंग याद कर लेना भी हमें तुम्हारे प्यार का भागी बना देता है। तुम्हारी दिनचर्या को रटने में अपनी दिनचर्या भूला बैठते है,क्या करें तुमसे प्यार जो कर बैठते हैं। कभी तुमको एक झलक देख लेने के लिए सारा दिन गवां देने में भी किसी दिहाडी के मजदूर सी खुशी को पा लेते हैं जिसके दिन भर की मजदूरी तुम्हारी एक झलक जैसी हो। तो कभी भीड़ से गुजरते हुए भी तुम्हारी इत्र की खुशबू को पहचान लेते हैं। तुम्हारे जुड़ों से लेकर जूतों तक कि सारी चीज़ों की महीनता को याद कर जाते हैं, बस एक दफा मुस्कुराकर देख लोगी इसी आश में जवानी बर्बाद कर जाते हैं। गिनाने को तो ऐसी बहुत सी चीजें है जो लड़के सिर्फ तुमसे आकर्षित होकर ही कर जाते हैं। खैर तुमने कभी इन बातों को न जाना हो मगर एक तुमको चाहने में लड़के तुम्हारे साथ साथ सब कुछ चाहने लग जाते हैं।


(प्रेम या आकर्षण में आकर ऐसी कई बेतुकी बातें है जो लड़के किसी लड़की के लिए कर जाते हैं परंतु एक निश्चित कालावधि के बाद उनको स्वतः ही बोध हो जाता है कि वो कितना बचकाना और मूर्खतापूर्ण व्यवहार किसी लड़की के आकर्षण में कर गए थे।)

Sunday, 24 October 2021

पहली मोहोब्बत

                           पहली मोहोब्बत


बांहो में सिमटकर 
जब सीने से लगाया होगा,
पागलपन सिर्फ मेरा ही नही
इश्क़ ने पागल तुम्हे भी बनाया होगा।

दिल सिर्फ मेरा ही नही बैठा होगा
कदम तुम्हारे भी डगमगाए होंगे,
प्रेम कहानी अधूरी लिखने में
हाथ तुम्हारे भी थरथराए होंगे।

यूँ ही नही चांदनी रात में
तुम सिर्फ अलविदा कहने आयी होगी,
उस आखिरी चुम्बन पर 
आँखें तो तुम्हारी भी भर आयी होगी।

कहीं और से तुमने भी
पहली मोहोब्बत का एहसास पाया होगा,
मेरी पहली मोहोब्बत तुम ही थी जानोगी तब 
जब मेरे बाद तुमको मेरा प्यार समझ आया होगा।

                                              :- संदीप प्रजापति

Saturday, 9 October 2021

नौकरी

नौकरी


काम पसन्द हो न हो,
फिर भी काम कराती है।
ऊंचे ऊंचे लाखों सपनों को,
चंद रुपयों से मार गिराती है।
कभी घर परिवार से तो,
कभी अपनों से दूर कराती है।
कई अनजान चेहरों से मिलाती है,
हाय... ये नौकरी क्या क्या कराती है।

न मरने देती है,
न ही जिलाती है।
भर दिन दौड़ाती है,
नींद कहाँ आने देती है।
सैकड़ों झूठ बुलाती है,
सहपाठियों से लड़ाती है।
बाबूओं के तलवे भी चटाती है,
हाय... ये नौकरी क्या क्या कराती है।

कुछ जिंदगी से लड़ने को,
तो कुछ जिम्मेदारियों के नाते।
गैरों की चाकरी करते हैं,
हाँ हम भी नौकरी करते हैं।
पर इन सब से दूर,
हमने भी कई सपने पाल रखे हैं।
जीवन भर यूँ ही,
नौकरी ही न करते रहने का ख्याल रखे हैं।
कुछ कठोर फैसलें होंगें,
हालातों से ऊंचे हमारे हौसलें होंगे।
एक दिन हम भी बाबू साहब होंगे,
हमारी भी लोग नौकरी करेंगें।

                                           :- संदीप प्रजापति


(हालातों के चलते न चाहते हुए भी मन मार के नौकरी करने वाले सभी लोगों को समर्पित।)

एक संगिनी

एक संगिनी तुम्हारा मिलना  जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...