Sunday, 23 October 2022

मिट्टी को जब-जब चाक धरा...


              मिट्टी को जब-जब चाक धरा...



मिट्टी को जब-जब चाक धरा,
रच बर्तन में आकार गढ़ा,
बर्तन मिट्टी से बचा धरा,
क्यों मैं कुम्हार लाचार पड़ा?

क्या याद तुम्हें वह गुल्लक है,
पीते लस्सी वह कुल्हड़ है,
रुक पीते पानी मटके का,
क्या याद तुम्हें वह नुक्कड़ है?

अब याद न तुमको है आती,
थी चाय जो कुल्हड़ में भाती,
मिट्टी की खुशबू को लाती,
वह प्यार धरा का बतलाती। 

वह शीतल जल देने वाली,
अब कहाँ सुराही चली गयी,
जगमग मिट्टी के दीपक से,
वह राम दिवाली कहाँ गयी?

अक्सर रोता हूँ रातों में,
अपने पुश्तैनी कामों में,
काम न अब यह काम आता,
त्योहारों पर बस दीप बनाता,

बेच न उनको पूरा पाता,
रौनक झालर सी दे पाता,
हृदय प्रश्न अब अक्सर आता,
क्यों मिट्टी के दिये बनाता?

इस जग से मैं हूँ बहुत लड़ा,
कर रहा प्रतीक्षा हूँ खड़ा,
फिर से मुझ तक तुम आओगे,
मिट्टी के दिये जलाओगे!

- कवि बीरेन्द्र कुमार

Copied

(इन मार्मिक पंक्तियों को अपने ब्लॉग पर कॉपी करने से खुद को रोक न पाया।)

कुम्हारी एक कला थी, हमसे छूट गई।
ख्वाइशें माटी की, माटी में ही टूट गई।।
:- संदीप प्रजापति

Friday, 26 August 2022

मेरी पहली किताब : एहसासों की जुबां

 मेरी पहली किताब : एहसासों की जुबां


            'एहसासों की जुबां'  यह मेरी पहली ही किताब है। जिसे शाश्वत पब्लिकेशन  के द्वारा प्रकाशित की गई है। मैं पूर्ण आदर और प्रेम सहित शाश्वत पब्लिकेशन परिवार का धन्यवाद करना चाहूँगा। जिन्होंने मुझे यह अवसर प्रदान किया और मेरे विचारों को सचमुच एक अमूर्त शाश्वत स्वरूप दिया।
          'एहसासों की जुबां' इस किताब में मैंने संघर्ष, प्रेम, विचारों, कल्पनाओं और भावनाओं जैसे मानवीय गुणों को एकत्रित करके कुछ काव्य और पंक्तियाँ संग्रहित की हैं। जो मैं आप ईश्वर समान पाठकगण को भोग स्वरूप अर्पित करना चाहूँगा। मैं चाहूँगा की आप केवल इसके रस का आस्वादन करें और मुझ अज्ञानी से कोई भूल हुई हो तो क्षमा कर दें।
             चूँकि यह मेरी पहली ही किताब है, मुझे प्रकाशन का अधिक ज्ञान और अनुभव भी न था। इसीलिए मैं चाहूँगा की कोई त्रुटि हो तो अबोध जानकर आप सभी लोग मुझे क्षमा कर देंगे और अपना प्रेम और विश्वास प्रदान करेंगे।
धन्यवाद!

 
                                                        आपका,
                                                        संदीप प्रजापति



   

Sunday, 24 July 2022

खुशियों के मौसम हुआ करते थे,
न जाने कहाँ से ये बदली छा गई।

अभी घर से कुछ दूर चला ही था,
राह में फिर एक नई मुसिबत आ गई।

जिंदगी आसां होती जो हम नादां होते,
हमको ये हमारी समझदारी खा गई।

सफलता हमारे भी कदमों में होती ,
जाना तुमको हमारी नाकामी भा गई।

मोहोब्बत हमारे भी दिलों में होता 'संदीप'
मगर हमसे तो हमारी आवारगी ना गई।

:- संदीप प्रजापति


Wednesday, 13 July 2022

जब खुद से प्रेम नहीं हुआ तो दूसरों से कैसे होगा?

     जब खुद से प्रेम नहीं हुआ तो दूसरों से कैसे होगा?


       प्यार में गिरने या प्रेम में पड़ने को अंग्रेजी में कहते हैं- फॉल इन लव वास्तव में सच्चा प्रेम हमें गिराता नहीं, वह तो हमारे जीवन को ऊंचा उठाता है। जीवन प्रेम को जीने और प्रेम से जीने के लिए है। हमारे अनुभवों को सुखद और बेहतरीन बनाने के लिए है। देखा जाए तो दैहिक प्रेम स्वार्थी, सीमित और अल्पकालीन होते हैं। जबकि आत्मिक स्नेह निःस्वार्थ और दीर्घकालीन होते हैं। शारीरिक स्नेह या दैहिक संबंध हमें बंधन में डालता है। जबकि रूहानी स्नेह या संबंध हमें सारे सांसारिक कर्म बंधनों से मुक्त कर देता है। रूहानी स्मृति, दृष्टि और वृत्ति हमारे संबंधों को मधुर, सहनशील तथा संपूर्ण बनाती है।

       असल में हम कोई भी संबंध प्रेम देने और पाने के लिए बनाते हैं। प्रेम भावनात्मक पूर्णता का स्रोत है। सच्चा प्रेम हमारे जीवन में प्रगति का मार्गदर्शक बन जाता है। कई बार कोशिश के बावजूद हम प्रेम से वंचित रह जाते हैं। पर जब हम निर्मल प्रेम के चिरंतन स्रोत परमात्मा से अपनी अंतरात्मा जोड़ लेते हैं, तब हमारे जीवन में प्रेम की कोई कमी नहीं रहती। सबसे श्रेष्ठ आत्मिक और परमात्म प्रेम है। इससे प्रेम के मार्ग में आने वाली बाधाएं हट जाती हैं। संकीर्ण विश्वासों से ऊपर उठ कर हम सच्चे प्रेम के वाहक बन जाते हैं। साथ ही, इस प्रेम को महसूस करना और कराना हमारे लिए सहज और स्वाभाविक हो जाता है।

        हम अपने संबंधों के दायरे में निस्संदेह सभी से प्रेम करते हैं। सवाल है कि क्या हम उन्हें बिना शर्त प्रेम करते हैं? शायद नहीं क्योंकि हम अपनी अंतरात्मा के मूल गुण शांति, प्रेम और प्रसन्नता को अनुभव या व्यवहार में नहीं ला पाते हैं। फलस्वरूप जब हमारा मन व्याकुल होता है, तब हम स्थिर मन से उत्तर भी नहीं दे पाते हैं प्यार के बारे में सोचना तो दूर की बात रही। अक्सर हम अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों या हालात को दोषी ठहराते हैं। कभी हम दूसरों के लिए जजमेंटल होते हैं। कभी हम किसी को अपनी तरह काम न करते देख नाराज होते हैं। कभी दूसरे हमें स्वीकार नहीं करते। ये सब बातें हमारे प्रेम के प्रवाह में बाधा पैदा करती हैं। तब हम अंतरात्मा के मूल गुण प्रेम का अनुभव करना बंद कर देते हैं, और सामने वाले से उस प्यार को पाने की अपेक्षा करते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ कर ही प्रेम के अनंत स्रोत परमात्मा तक पहुंच सकते हैं।

       दूसरी बात, बहुत से लोग केवल अपनी शर्तों पर ही प्रेम करते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि वे इसे बाहर खोजते हैं। असल में प्रेम का अनुभव आपसे ही आरंभ होता है। अगर आप खुद से प्रेम नहीं करते हैं, तो आप के लिए दूसरों से प्यार करना संभव ही नहीं है। जब आप खुद को प्रेम करने लगते हैं, तो उसे दूसरों को देना सहज हो जाता है। तब आप आसानी से मोह, अपेक्षा, स्वामित्व भाव या दूसरों को नियंत्रित करने जैसी प्रेम विरोधी भावनाओं का परित्याग कर पाते हैं। जब मन में अपने और दूसरों के प्रति स्नेह का भाव साफ हो, तो संबंधों में पैदा होने वाली ऊर्जा शुद्ध होती है। तब दया, करुणा और सहयोग जैसी श्रेष्ठ भावनाएं प्रेम का प्रवेश द्वार बन जाती हैं हम दूसरों के प्रेम को पाने की अपेक्षा से हट कर जीवन को बदलने वाली परमात्म प्राप्ति की ओर बढ़ पाते हैं।
:- ब्रह्मा कुमारी शिवानी

(नवभारत टाइम्स के लेख से)

Sunday, 10 July 2022

प्रेम रिक्ति

                            प्रेम रिक्ति


पूज्य थी जो सूलोचनी
जाने वो किस ओर चली।
मेरे इस देवालय को
सूना देवहीन छोड़ चली।।

जाने वो किस ठौर चली
शीशा एक दिल तोड़ चली।
रहे खुश आबाद रहे 
मुझ निर्बल का तो राम ही बली।।

उसकी देह से खूबसूरत
उसका मन जाना था।
हाँ हाँ मैंने जाना था 
उसको अपना तन मन जाना था।।

गोल गोल थी गोरी बाहें
रूप और जौबन की वो मूरत।
भूलूँ जग सारा भूलूँ भगवन
जब लखूँ निष्ठुर की मोहनी वो सूरत।।

पूजूँ मैं अब किसको पूजूँ
किसको दूँ मैं प्रेम धूप दीप।
नाम एक उसी का जानूँ मैं
दूजा नाम किसका भजूँ 'संदीप'।।

दोष धरूँ न मैं उसपर
रोष करूँ न मैं उसपर
मेरे तो तुम हो प्रेमनिधि राम
तुमसे अधिक प्रेम करूँ मैं किसपर।

देव दो संबल इतना
उसके संग की यादें बिसरुँ।
रोऊँ सिसकूँ हिम्मत बाँधूं
और फिर मैं हीरे सा निखरुँ।।

जाऊँ जिधर सो कीर्ति हो
इतनी सहज सरल प्रकृति हो।
दे दो निज पग प्रेम प्रभु इतना
मेरे हिए प्रेम रिक्ति की परिपूर्ति हो।।
       
                                             :- संदीप प्रजापति

( प्रस्तुत कविता लेखक के अपने निजी भाव और कल्पना की प्रस्तुति है। पाठक को कोई त्रुटि नजर आए तो अवश्य सुझाव दें। आशा है कि आप मेरी इस कविता को अपना आशीर्वाद और प्रेम देंगें।)

Wednesday, 6 July 2022

नर से नारी तक

                          नर से नारी तक...


           घरेलू औरत क्या होती है जानने के लिए आपको जीना होगा औरतों का सा जीवन। आपको अपनी निजी इच्छाओं को मारकर सबके लिए एक बिना मेहनताना वाला मजदूर होना होगा। आपको होना होगा सबकी खुशी का जरिया और सबकी जरूरतों का पिटारा। और हाँ इतना सब कुछ करने के बाद भी निश्चित नहीं कि आप अपने औरत होने पर खरे उतर पाए। 
        पुरुषों के लिए जरूरी है कि वो अपने पुरुषार्थ के बल से अपने भीतर नारीत्व को भी जानने की कोशिश करें। जिस पुरुष ने अपने भीतर बसे नारीत्व को नहीं जाना वो कभी संसार एवं प्रकृति को नहीं जान सकता। वो कभी एक श्रेष्ठ पुरुष कहलाने के योग्य नहीं हो सकता है। जब तक पुरुष अपने में नारीत्व को नहीं जानेगा तब तक न वो अपने सहज भावों को जान सकेगा और न ही अपने दुखों पर स्वछंद रो सकेगा। 
                          :- संदीप प्रजापति

(यह अनुच्छेद लेखक के निजी विचार है। किसी वर्ग विशेष से इसका कोई सरोकार नहीं है।)

Sunday, 3 July 2022

इजहार...

                               इजहार...

क्या एक तुम ही हो 
बला की खूबसूरत,
या कोई और सूरत
मैं इन आँखों में नहीं भरता।

बेबाक मैं कह न सका
प्रेम भाव तुमने जाना नहीं,
ठुकरा दो या स्वीकार करलो 
इन बेरुखियों से जीवन नहीं चलता।

यूँ हँसने मुस्कुराने बातें भर
कर लेने से जी नहीं भरता,
दिल तुम्ही को चाहता है
किसी और पर क्यों नहीं मरता।

चाहो न चाहो आजादी है
यूँ तिरछी चाल चलो नहीं,
प्रेम करो सो जीवन दो
यूँ प्रेम में किसी को छलो नहीं।

प्रेम तुम्हे मानता हूँ
सो अब इंतजार कर रहा हूँ,
न चाँदनी रात है न कभी गुलाब दिया
बस कविताओं से इजहार कर रहा हूँ।
                                            :- संदीप प्रजापति

याद आता है...


                      याद आता है...

तन्हाइयों को कहाँ दफनाया जाए,
उसके न होने पर उसका होना याद आता है।

गम न होते तो चेहरे हमारे भी मुस्कुराते,
इन रुसवाइयों में तो बस रोना याद आता है।

रात थी खाब थे नींद थी बस सो न सके,
सहर हुआ तो वो तकिया बिछौना याद आता है।

बस आज ही की तो बात है कल तलक भुला देंगें,
सारी जिंदगी कहाँ किसी को खोना याद आता है।

कलम का रोना कागज भिगोना याद आता है,
'संदीप' उसके जिस्म का हर कोना याद आता है।

:- संदीप प्रजापति

Sunday, 29 May 2022

बनारस : एक अद्भुत स्थान

                         बनारस : एक अद्भुत स्थान

           क्या आप कभी बनारस गए हैं? चलिए आज मैं आपको बनारस लिए चलता हूँ। हो सकता है आपमें से कई लोग गए भी हों। तो मैं आज आपकी उस बनारस स्मृति को इस लेख के माध्यम से पुनःजीवित कर देना चाहूँगा।

     बनारस, उत्तरप्रदेश की पावन धरती पर बसा संसार का प्राचीनतम और आध्यात्मिक शहर है। जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है और इसका उल्लेख हिन्दू धर्म ग्रन्थों में भी मिलता है। मान्यता है कि बनारस में देह छोड़ने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल से ही देश विदेश से लोग अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने बनारस आते हैं।

            दशाश्वमेध की गंगा आरती, घाटों का लंबा सिलसिला, साधु-संतों का जमघट, मणिकर्णिका की जलती चिताओं की लौ, बाबा काशी विश्वनाथ के जयकारे, सारनाथ की शांति, बनारसी ठाठ, बनारसी भौकाल, बनारसी साड़ी, बनारसी पान, बनारस की सँकरी गलियाँ, ठंडाई, और ऐसे ही न जाने कितने ही मनमोहक दृश्य और भावनाओं का सम्मेलन है ये बनारस। 

            पिछले कुछ वर्षों से राजनैतिक महत्ता बढ़ने से बनारस की चकाचौंध में तो और चार चांद लग गए हैं। जिसने बनारस को प्रगति की ओर अग्रसर करके इस शहर का कायाकल्प कर दिया है। आए दिन राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों का खूंटा बनारस की माटी में गड़ा रहता है। जिससे इसे वैश्विक पटल पर और अत्यधिक मान्यता एवं पहचान मिल रही है।

               आइये हम अपनी यात्रा शुरू करते हैं, बनारस आने के लिए सम्पूर्ण भारत से ट्रेन और हवाई जहाज की सुव्यवस्था है। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरह यहाँ आ सकते हैं। बनारस आने पर आपको दिन के समय में तो सारनाथ और इत्यादि जगहों पर ही घूम लेना चाहिए। जिससे आप शाम के समय में गंगा जी के घाट पर जा सके और माँ गंगा के दर्शन और स्नान करके खुद को पापमुक्त कर सकें।

                 बाबा काशी विश्वनाथ जी के दर्शन करना अपने आप में ही एक उपलब्धि है। सोने से जड़े बाबा के मंदिर का मनोहर दृश्य देखना हृदय को ही स्वर्णमयी कर देता है। गंगा कॉरिडोर से गंगा जी के दर्शन भी सुलभ हो जाते हैं। रात की जगमग चकाचौंध रोशनी में मंदिर और गंगा जी का दृश्य बहुत ही सुहावना होता है। बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर से लगा हुआ ही ज्ञानवापी मस्जिद भी यहीं पर स्थापित है। जिसे सुरक्षा कारणों से बंद रखा गया था। 

             गंगा जी के किनारों पर बसे प्रत्येक घाटों का अपना एक विशेष महत्त्व है। इन सब घाटों में मणिकर्णिका घाट सबसे महत्वपूर्ण है। जिसमें मृत चिताएं जलाई जाती हैं। माना जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर कभी भी चिताओं की अग्नि शांत नहीं होती। यहाँ हमेशा कोई न कोई चिता जलती ही रहती है। इस घाट के पास ही एक प्राचीन मंदिर है जो कि कई वर्षों से झुकी हुई है। फिर भी वह मंदिर उसी अवस्था में बिल्कुल ठीक-ठाक है।
       

    घाटों के इस क्रम में दशाश्वमेध घाट भी प्रमुख है क्योंकि यहीं पर माँ गंगाजी की भव्य आरती होती है। जिसका साक्षी होने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। गंगा  आरती होने के पश्चात लोग गंगा स्नान करते हैं और गंगा जी का धन्यवाद प्रकट करते हैं। अस्सी घाट और हरिश्चंद्र घाट भी प्रमुख घाट है। राजा हरिश्चंद्र जी के नाम पर ही इस घाट का नाम पड़ा था। आधी रात के वक्त घाट पर बैठ कर केवल अपने भीतर झाँकना और खुद को ईश्वर के समीप पाना ही असली आनंद है। गंगा जी में लहराती छोटी-छोटी नौकाएं मानो किसी इठलाती युवती सी हों जो आपका ध्यान अपनी ओर खींच ही लें।

          बनारस की इसी मनोरमता पर ही तो कई कवियों और लेखकों ने इस पर अपनी कल्पनाओं और अनुभवों से कई काव्य लिख डाले हैं। इसी बनारस के घाट पर बाबा तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस महाकाव्य की रचना की थी। बनारस की आभा में ऐसा जादू है कि यहाँ पर किसी की चेतना का जागृत होना कोई अचरज नहीं। हमारे देश के कई महान विभूतियों का बनारस से अत्यधिक लगाव रहा है।

     हिंदी फिल्म जगत में बनारस पर कई फिल्में चित्रित की गई हैं। कई गीतों के बोल इसी पर आधारित है। संगीत और नृत्य के क्षेत्र में भी बनारसी घराने का विशेष महत्त्व रहा है। इसी बनारस की माटी ने कई दिग्गज कलाकार भी उपजें हैं। गालिब ने बनारस को दुनिया के दिल का नुक़्ता कहना दुरुस्त पाया था। जिसकी हवा मुर्दों के बदन में भी रूह फूँक देती है और जिसकी ख़ाक के जर्रे मुसाफिरों के तलवे से काँटें खींच निकालते हैं। बनारस को एक जगह भर नहीं एक संस्कृति कहा जाता है, जो हमेशा से कला, साहित्य, धर्म और दर्शन के अध्येताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

अंत में कुछ पंक्तियाँ:-

सुनो हमसफ़र
चाहे रहो जहाँ,
पर जब भी मुलाकात हो
बस गंगा जी का घाट हो।
होंठ मेरे हो
तुम्हारे ललाट हो,
अनकही एक बात हो
और गंगा जी का घाट हो।
                                      :- संदीप प्रजापति

( बनारस के विषय में लिखना कभी समाप्त होने योग्य नहीं है। लेख को बस इतनी ही भावनाओं में समेटते हुए यहीं रुक जाना ठीक है। लेख के किसी विषय वस्तु में कोई त्रुटि हो तो अवश्य सूचित करें अरबअपने विचार प्रकट करें। आशा करता हूँ कि आपको इस लेख के माध्यम से ही बनारस के जीवंत स्वरूप का दर्शन हुआ है।)

Sunday, 8 May 2022

समझदारी या सूंदर नारी

                       समझदारी या सूंदर नारी

जरूरी नहीं है कि हमारा साथी दुनिया का सबसे सुंदर व्यक्ति ही हो। मैं चाहूँगा की जो भी व्यक्ति मेरा साथ चुने वो ज्यादा सूंदर न भी हो तो ठीक है क्योंकि मैं जानता हूँ की मैं भी एक सामान्य मोहनी का व्यक्ति हूँ। इसीलिए किसी इच्छा के प्रति बेहद अपेक्षाएँ रखना जीवन में दुख का कारण हो सकता है। एक हद तक रंग रूप में किसी जोड़े का समान होना भी  जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक है। जहाँ तक बात आती है सुंदरता की, तो मैं मानता हूँ कि समझदारी सुंदरता को मात दे सकती है। एक समझदार साथी किसी सूंदर साथी से कई गुना बेहतर हो सकता है। किसी सूंदर स्त्री का गुलाम होने से एक समझदार स्त्री का जीवनसाथी होना कई गुना बेहतर हो सकता है। मेरी स्त्री दुनिया में सबसे खूबसूरत न हो तो भी ठीक पर मेरे लिए उसका समझदार होना ज्यादा मायने रखता है। उसके पास केवल दुनिया का सबसे खूबसूरत हृदय हो जिससे वो परिवार में सभी का प्रेम पा सके और सबसे स्नेह रखे।

                                                       :- संदीप प्रजापती


नोट:- जिस किसी को दोनों गुण एक ही स्त्री में प्राप्त हो रहा हो वह मेरी इन दकियानूसी बातों पर ध्यान न दे।

( यह छोटा सा लेख मेरे सहित उन सभी भाइयों को समर्पित है जो अप्सरा सी नारी खोज रहे हैं, खुद भले ही कैसे भी हों। एक वक्त तक सभी लड़कों की सोच या चाहत यही होती है कि सूंदर लड़की मिले। परंतु जब इच्छानुसार सुंदरता अपने साथी में नहीं पाते हैं तो जीवन में टकराव की स्तिथि को जन्म दे देते है। ऐसे में हमें हमारी सोच बदलनी होगी और समझदार व्यक्ति को चुनने की सोच विकसित करनी होगी। 
यह लेखक की अपनी व्यक्तिगत विचारधारा है किसी की भावनाएं आहत हुई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ, कोई सुझाव हो तो प्रतिक्रिया जरूर दें।)

Saturday, 7 May 2022

माँ

                                   माँ


   जब भी हम हिम्मत हारते हैं। उदास, हताश या निराश हो जाते हैं। जब भी लगने लगता है कि हम जीवन में असफल हो गए हैं। हम ने सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जब थक हार कर बैठ जाते हैं और लगते हैं कोसने जीवन को। तब हम अपनी अम्मा को फोन लगाते हैं। और लगते हैं रोने, जी भर के रोने। काहे से की हमें अम्मा के अलावा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं नजर आता जिसके आगे हम रो सके। मां ने कभी रोने से तो माना नही किया, पर वो जान जाती है की बात क्या है। वैसे अम्मा हमारी इसमें कर तो कुछ नहीं सकती पर जाने कौन सी हिम्मत फूँक देती है की सारी मायूसी एक आशा की किरण में बदल जाती है। लगने लगता है की अब सब ठीक हो जायेगा। अम्मा बस इतना कहती है की बबुआ मेहनत करते रहो और कभी हार न मानना जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही। उम्मीद न छोड़ना अगर किसी लायक हो जाओगे तो देर सबेर ईश्वर तुमको सफलता भी देंगे और न भी दिए तो इसका मतलब ये नही की तुम काबिल नही हो। वो कहती है की भाग्य में होगा तो सुख भी आएगा और न होगा तो कितने ही बड़े बन जाओगे तो भी सुखी न रह पाओगे। हम नही जानते की अम्मा इतनी सकारात्मकता लाती कहाँ से है, मगर हमें प्रेरणा के लिए किसी और के जीवन को ताकने की जरूरत नहीं पड़ती।

एक संगिनी

एक संगिनी तुम्हारा मिलना  जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...