कविताएँ, शायरियाँ, लघुकथा, यात्रा वृत्तांत, प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक बातें और भी बहुत कुछ हिंदी में...
Sunday, 10 July 2022
प्रेम रिक्ति
Wednesday, 6 July 2022
नर से नारी तक
Sunday, 3 July 2022
इजहार...
याद आता है...
Sunday, 29 May 2022
बनारस : एक अद्भुत स्थान
Sunday, 8 May 2022
समझदारी या सूंदर नारी
Saturday, 7 May 2022
माँ
माँ
जब भी हम हिम्मत हारते हैं। उदास, हताश या निराश हो जाते हैं। जब भी लगने लगता है कि हम जीवन में असफल हो गए हैं। हम ने सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जब थक हार कर बैठ जाते हैं और लगते हैं कोसने जीवन को। तब हम अपनी अम्मा को फोन लगाते हैं। और लगते हैं रोने, जी भर के रोने। काहे से की हमें अम्मा के अलावा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं नजर आता जिसके आगे हम रो सके। मां ने कभी रोने से तो माना नही किया, पर वो जान जाती है की बात क्या है। वैसे अम्मा हमारी इसमें कर तो कुछ नहीं सकती पर जाने कौन सी हिम्मत फूँक देती है की सारी मायूसी एक आशा की किरण में बदल जाती है। लगने लगता है की अब सब ठीक हो जायेगा। अम्मा बस इतना कहती है की बबुआ मेहनत करते रहो और कभी हार न मानना जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही। उम्मीद न छोड़ना अगर किसी लायक हो जाओगे तो देर सबेर ईश्वर तुमको सफलता भी देंगे और न भी दिए तो इसका मतलब ये नही की तुम काबिल नही हो। वो कहती है की भाग्य में होगा तो सुख भी आएगा और न होगा तो कितने ही बड़े बन जाओगे तो भी सुखी न रह पाओगे। हम नही जानते की अम्मा इतनी सकारात्मकता लाती कहाँ से है, मगर हमें प्रेरणा के लिए किसी और के जीवन को ताकने की जरूरत नहीं पड़ती।
Tuesday, 26 April 2022
कुछ लिख दूँ...
कुछ लिख दूँ...
1.
कभी-कभी सोचता हूँ कि,
एक कविता बस यूँ ही लिख दूँ।
सारी की सारी तारीफें लिख दूँ,
जुल्फें आँखे होंठ गर्दन और तिल।
सब कुछ स्मृतियों में उतारू ,
और फिर तेरा रूप कागज़ पर रख दूँ।
लिख दूँ दिल की वो सारी बातें ,
जो मैं तुझसे कभी कह ही न पाया।
एक एहसास था दिल में,
जो कभी लबों तक न आया।
पहली मुलाक़ातें तेरी बातें,
मेरा इकरार तेरा इनकार लिख दूँ।
मुझ जैसे कई और हैं चाहने वाले तुम कहती थी
फिर भी लिख दूँ तुमको पहला प्यार लिख दूँ।
2.
याद है वो कोचिंग के दिन,
जब तुम मुझसे मदद लेती थी।
किसी सवाल को हल करने के बहाने,
छुपके से उन गोरे हाथों को छू लेता था।
सच कहता हूँ बस एक वो ही दिन थे,
जब मैं भी किसी को ईश्क़ कर लेता था।
है पता वो बस मतलब के दिन थे,
कुछ पल ही थे पर बेहद हसीन थे।
तुम मुझसे कुछ सवाल सीख लेती थी,
मैं तुमको देख नीत नए ख्याल लिख लेता था।
3.
कई बार खूब व्यस्त रहकर भी,
तुझको अहमियत दी थी।
बेमतलब से एक लगाव को भी,
हमने इतनी खासियत दी थी।
एक झलक तेरी देखने को,
तुझको पढ़ाना पड़ता था।
हाय रे कमबख्त ईश्क़,
नौटंकी उठाना पड़ता था।
पर अब खुशी होती है,
किसी के लिए हम भी अजीज थे।
शायद एक उम्मीद थे मीत थे
कुछ न थे पर हर मतलब में करीब थे।
(कुछ ख्यालों को यूँ ही लिख लेना चाहिए। स्मृतिपटल पर चलते कुछ रंगीन नजारों को शब्दों में पिरोकर एक कविता की माला गूंथ ईश्वर को भेंट कर देना भी भक्ति का ही स्वरूप है।)
Monday, 25 April 2022
मैंने देखा है...
Wednesday, 20 April 2022
तुम आना जरूर...
Saturday, 26 March 2022
जीवटता की ओर...
एक संगिनी
एक संगिनी तुम्हारा मिलना जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...
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प्राण बिन एक देह छोड़ गई हो... वो मन्दिर के कायदे वो जन्मों जन्मों के वायदे, वो साथ होने की रसमें वो सच्ची झूठी कसमें। सब कुछ ...