Sunday, 10 July 2022

प्रेम रिक्ति

                            प्रेम रिक्ति


पूज्य थी जो सूलोचनी
जाने वो किस ओर चली।
मेरे इस देवालय को
सूना देवहीन छोड़ चली।।

जाने वो किस ठौर चली
शीशा एक दिल तोड़ चली।
रहे खुश आबाद रहे 
मुझ निर्बल का तो राम ही बली।।

उसकी देह से खूबसूरत
उसका मन जाना था।
हाँ हाँ मैंने जाना था 
उसको अपना तन मन जाना था।।

गोल गोल थी गोरी बाहें
रूप और जौबन की वो मूरत।
भूलूँ जग सारा भूलूँ भगवन
जब लखूँ निष्ठुर की मोहनी वो सूरत।।

पूजूँ मैं अब किसको पूजूँ
किसको दूँ मैं प्रेम धूप दीप।
नाम एक उसी का जानूँ मैं
दूजा नाम किसका भजूँ 'संदीप'।।

दोष धरूँ न मैं उसपर
रोष करूँ न मैं उसपर
मेरे तो तुम हो प्रेमनिधि राम
तुमसे अधिक प्रेम करूँ मैं किसपर।

देव दो संबल इतना
उसके संग की यादें बिसरुँ।
रोऊँ सिसकूँ हिम्मत बाँधूं
और फिर मैं हीरे सा निखरुँ।।

जाऊँ जिधर सो कीर्ति हो
इतनी सहज सरल प्रकृति हो।
दे दो निज पग प्रेम प्रभु इतना
मेरे हिए प्रेम रिक्ति की परिपूर्ति हो।।
       
                                             :- संदीप प्रजापति

( प्रस्तुत कविता लेखक के अपने निजी भाव और कल्पना की प्रस्तुति है। पाठक को कोई त्रुटि नजर आए तो अवश्य सुझाव दें। आशा है कि आप मेरी इस कविता को अपना आशीर्वाद और प्रेम देंगें।)

Wednesday, 6 July 2022

नर से नारी तक

                          नर से नारी तक...


           घरेलू औरत क्या होती है जानने के लिए आपको जीना होगा औरतों का सा जीवन। आपको अपनी निजी इच्छाओं को मारकर सबके लिए एक बिना मेहनताना वाला मजदूर होना होगा। आपको होना होगा सबकी खुशी का जरिया और सबकी जरूरतों का पिटारा। और हाँ इतना सब कुछ करने के बाद भी निश्चित नहीं कि आप अपने औरत होने पर खरे उतर पाए। 
        पुरुषों के लिए जरूरी है कि वो अपने पुरुषार्थ के बल से अपने भीतर नारीत्व को भी जानने की कोशिश करें। जिस पुरुष ने अपने भीतर बसे नारीत्व को नहीं जाना वो कभी संसार एवं प्रकृति को नहीं जान सकता। वो कभी एक श्रेष्ठ पुरुष कहलाने के योग्य नहीं हो सकता है। जब तक पुरुष अपने में नारीत्व को नहीं जानेगा तब तक न वो अपने सहज भावों को जान सकेगा और न ही अपने दुखों पर स्वछंद रो सकेगा। 
                          :- संदीप प्रजापति

(यह अनुच्छेद लेखक के निजी विचार है। किसी वर्ग विशेष से इसका कोई सरोकार नहीं है।)

Sunday, 3 July 2022

इजहार...

                               इजहार...

क्या एक तुम ही हो 
बला की खूबसूरत,
या कोई और सूरत
मैं इन आँखों में नहीं भरता।

बेबाक मैं कह न सका
प्रेम भाव तुमने जाना नहीं,
ठुकरा दो या स्वीकार करलो 
इन बेरुखियों से जीवन नहीं चलता।

यूँ हँसने मुस्कुराने बातें भर
कर लेने से जी नहीं भरता,
दिल तुम्ही को चाहता है
किसी और पर क्यों नहीं मरता।

चाहो न चाहो आजादी है
यूँ तिरछी चाल चलो नहीं,
प्रेम करो सो जीवन दो
यूँ प्रेम में किसी को छलो नहीं।

प्रेम तुम्हे मानता हूँ
सो अब इंतजार कर रहा हूँ,
न चाँदनी रात है न कभी गुलाब दिया
बस कविताओं से इजहार कर रहा हूँ।
                                            :- संदीप प्रजापति

याद आता है...


                      याद आता है...

तन्हाइयों को कहाँ दफनाया जाए,
उसके न होने पर उसका होना याद आता है।

गम न होते तो चेहरे हमारे भी मुस्कुराते,
इन रुसवाइयों में तो बस रोना याद आता है।

रात थी खाब थे नींद थी बस सो न सके,
सहर हुआ तो वो तकिया बिछौना याद आता है।

बस आज ही की तो बात है कल तलक भुला देंगें,
सारी जिंदगी कहाँ किसी को खोना याद आता है।

कलम का रोना कागज भिगोना याद आता है,
'संदीप' उसके जिस्म का हर कोना याद आता है।

:- संदीप प्रजापति

Sunday, 29 May 2022

बनारस : एक अद्भुत स्थान

                         बनारस : एक अद्भुत स्थान

           क्या आप कभी बनारस गए हैं? चलिए आज मैं आपको बनारस लिए चलता हूँ। हो सकता है आपमें से कई लोग गए भी हों। तो मैं आज आपकी उस बनारस स्मृति को इस लेख के माध्यम से पुनःजीवित कर देना चाहूँगा।

     बनारस, उत्तरप्रदेश की पावन धरती पर बसा संसार का प्राचीनतम और आध्यात्मिक शहर है। जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है और इसका उल्लेख हिन्दू धर्म ग्रन्थों में भी मिलता है। मान्यता है कि बनारस में देह छोड़ने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल से ही देश विदेश से लोग अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने बनारस आते हैं।

            दशाश्वमेध की गंगा आरती, घाटों का लंबा सिलसिला, साधु-संतों का जमघट, मणिकर्णिका की जलती चिताओं की लौ, बाबा काशी विश्वनाथ के जयकारे, सारनाथ की शांति, बनारसी ठाठ, बनारसी भौकाल, बनारसी साड़ी, बनारसी पान, बनारस की सँकरी गलियाँ, ठंडाई, और ऐसे ही न जाने कितने ही मनमोहक दृश्य और भावनाओं का सम्मेलन है ये बनारस। 

            पिछले कुछ वर्षों से राजनैतिक महत्ता बढ़ने से बनारस की चकाचौंध में तो और चार चांद लग गए हैं। जिसने बनारस को प्रगति की ओर अग्रसर करके इस शहर का कायाकल्प कर दिया है। आए दिन राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों का खूंटा बनारस की माटी में गड़ा रहता है। जिससे इसे वैश्विक पटल पर और अत्यधिक मान्यता एवं पहचान मिल रही है।

               आइये हम अपनी यात्रा शुरू करते हैं, बनारस आने के लिए सम्पूर्ण भारत से ट्रेन और हवाई जहाज की सुव्यवस्था है। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरह यहाँ आ सकते हैं। बनारस आने पर आपको दिन के समय में तो सारनाथ और इत्यादि जगहों पर ही घूम लेना चाहिए। जिससे आप शाम के समय में गंगा जी के घाट पर जा सके और माँ गंगा के दर्शन और स्नान करके खुद को पापमुक्त कर सकें।

                 बाबा काशी विश्वनाथ जी के दर्शन करना अपने आप में ही एक उपलब्धि है। सोने से जड़े बाबा के मंदिर का मनोहर दृश्य देखना हृदय को ही स्वर्णमयी कर देता है। गंगा कॉरिडोर से गंगा जी के दर्शन भी सुलभ हो जाते हैं। रात की जगमग चकाचौंध रोशनी में मंदिर और गंगा जी का दृश्य बहुत ही सुहावना होता है। बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर से लगा हुआ ही ज्ञानवापी मस्जिद भी यहीं पर स्थापित है। जिसे सुरक्षा कारणों से बंद रखा गया था। 

             गंगा जी के किनारों पर बसे प्रत्येक घाटों का अपना एक विशेष महत्त्व है। इन सब घाटों में मणिकर्णिका घाट सबसे महत्वपूर्ण है। जिसमें मृत चिताएं जलाई जाती हैं। माना जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर कभी भी चिताओं की अग्नि शांत नहीं होती। यहाँ हमेशा कोई न कोई चिता जलती ही रहती है। इस घाट के पास ही एक प्राचीन मंदिर है जो कि कई वर्षों से झुकी हुई है। फिर भी वह मंदिर उसी अवस्था में बिल्कुल ठीक-ठाक है।
       

    घाटों के इस क्रम में दशाश्वमेध घाट भी प्रमुख है क्योंकि यहीं पर माँ गंगाजी की भव्य आरती होती है। जिसका साक्षी होने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। गंगा  आरती होने के पश्चात लोग गंगा स्नान करते हैं और गंगा जी का धन्यवाद प्रकट करते हैं। अस्सी घाट और हरिश्चंद्र घाट भी प्रमुख घाट है। राजा हरिश्चंद्र जी के नाम पर ही इस घाट का नाम पड़ा था। आधी रात के वक्त घाट पर बैठ कर केवल अपने भीतर झाँकना और खुद को ईश्वर के समीप पाना ही असली आनंद है। गंगा जी में लहराती छोटी-छोटी नौकाएं मानो किसी इठलाती युवती सी हों जो आपका ध्यान अपनी ओर खींच ही लें।

          बनारस की इसी मनोरमता पर ही तो कई कवियों और लेखकों ने इस पर अपनी कल्पनाओं और अनुभवों से कई काव्य लिख डाले हैं। इसी बनारस के घाट पर बाबा तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस महाकाव्य की रचना की थी। बनारस की आभा में ऐसा जादू है कि यहाँ पर किसी की चेतना का जागृत होना कोई अचरज नहीं। हमारे देश के कई महान विभूतियों का बनारस से अत्यधिक लगाव रहा है।

     हिंदी फिल्म जगत में बनारस पर कई फिल्में चित्रित की गई हैं। कई गीतों के बोल इसी पर आधारित है। संगीत और नृत्य के क्षेत्र में भी बनारसी घराने का विशेष महत्त्व रहा है। इसी बनारस की माटी ने कई दिग्गज कलाकार भी उपजें हैं। गालिब ने बनारस को दुनिया के दिल का नुक़्ता कहना दुरुस्त पाया था। जिसकी हवा मुर्दों के बदन में भी रूह फूँक देती है और जिसकी ख़ाक के जर्रे मुसाफिरों के तलवे से काँटें खींच निकालते हैं। बनारस को एक जगह भर नहीं एक संस्कृति कहा जाता है, जो हमेशा से कला, साहित्य, धर्म और दर्शन के अध्येताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

अंत में कुछ पंक्तियाँ:-

सुनो हमसफ़र
चाहे रहो जहाँ,
पर जब भी मुलाकात हो
बस गंगा जी का घाट हो।
होंठ मेरे हो
तुम्हारे ललाट हो,
अनकही एक बात हो
और गंगा जी का घाट हो।
                                      :- संदीप प्रजापति

( बनारस के विषय में लिखना कभी समाप्त होने योग्य नहीं है। लेख को बस इतनी ही भावनाओं में समेटते हुए यहीं रुक जाना ठीक है। लेख के किसी विषय वस्तु में कोई त्रुटि हो तो अवश्य सूचित करें अरबअपने विचार प्रकट करें। आशा करता हूँ कि आपको इस लेख के माध्यम से ही बनारस के जीवंत स्वरूप का दर्शन हुआ है।)

Sunday, 8 May 2022

समझदारी या सूंदर नारी

                       समझदारी या सूंदर नारी

जरूरी नहीं है कि हमारा साथी दुनिया का सबसे सुंदर व्यक्ति ही हो। मैं चाहूँगा की जो भी व्यक्ति मेरा साथ चुने वो ज्यादा सूंदर न भी हो तो ठीक है क्योंकि मैं जानता हूँ की मैं भी एक सामान्य मोहनी का व्यक्ति हूँ। इसीलिए किसी इच्छा के प्रति बेहद अपेक्षाएँ रखना जीवन में दुख का कारण हो सकता है। एक हद तक रंग रूप में किसी जोड़े का समान होना भी  जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक है। जहाँ तक बात आती है सुंदरता की, तो मैं मानता हूँ कि समझदारी सुंदरता को मात दे सकती है। एक समझदार साथी किसी सूंदर साथी से कई गुना बेहतर हो सकता है। किसी सूंदर स्त्री का गुलाम होने से एक समझदार स्त्री का जीवनसाथी होना कई गुना बेहतर हो सकता है। मेरी स्त्री दुनिया में सबसे खूबसूरत न हो तो भी ठीक पर मेरे लिए उसका समझदार होना ज्यादा मायने रखता है। उसके पास केवल दुनिया का सबसे खूबसूरत हृदय हो जिससे वो परिवार में सभी का प्रेम पा सके और सबसे स्नेह रखे।

                                                       :- संदीप प्रजापती


नोट:- जिस किसी को दोनों गुण एक ही स्त्री में प्राप्त हो रहा हो वह मेरी इन दकियानूसी बातों पर ध्यान न दे।

( यह छोटा सा लेख मेरे सहित उन सभी भाइयों को समर्पित है जो अप्सरा सी नारी खोज रहे हैं, खुद भले ही कैसे भी हों। एक वक्त तक सभी लड़कों की सोच या चाहत यही होती है कि सूंदर लड़की मिले। परंतु जब इच्छानुसार सुंदरता अपने साथी में नहीं पाते हैं तो जीवन में टकराव की स्तिथि को जन्म दे देते है। ऐसे में हमें हमारी सोच बदलनी होगी और समझदार व्यक्ति को चुनने की सोच विकसित करनी होगी। 
यह लेखक की अपनी व्यक्तिगत विचारधारा है किसी की भावनाएं आहत हुई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ, कोई सुझाव हो तो प्रतिक्रिया जरूर दें।)

Saturday, 7 May 2022

माँ

                                   माँ


   जब भी हम हिम्मत हारते हैं। उदास, हताश या निराश हो जाते हैं। जब भी लगने लगता है कि हम जीवन में असफल हो गए हैं। हम ने सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जब थक हार कर बैठ जाते हैं और लगते हैं कोसने जीवन को। तब हम अपनी अम्मा को फोन लगाते हैं। और लगते हैं रोने, जी भर के रोने। काहे से की हमें अम्मा के अलावा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं नजर आता जिसके आगे हम रो सके। मां ने कभी रोने से तो माना नही किया, पर वो जान जाती है की बात क्या है। वैसे अम्मा हमारी इसमें कर तो कुछ नहीं सकती पर जाने कौन सी हिम्मत फूँक देती है की सारी मायूसी एक आशा की किरण में बदल जाती है। लगने लगता है की अब सब ठीक हो जायेगा। अम्मा बस इतना कहती है की बबुआ मेहनत करते रहो और कभी हार न मानना जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही। उम्मीद न छोड़ना अगर किसी लायक हो जाओगे तो देर सबेर ईश्वर तुमको सफलता भी देंगे और न भी दिए तो इसका मतलब ये नही की तुम काबिल नही हो। वो कहती है की भाग्य में होगा तो सुख भी आएगा और न होगा तो कितने ही बड़े बन जाओगे तो भी सुखी न रह पाओगे। हम नही जानते की अम्मा इतनी सकारात्मकता लाती कहाँ से है, मगर हमें प्रेरणा के लिए किसी और के जीवन को ताकने की जरूरत नहीं पड़ती।

Tuesday, 26 April 2022

कुछ लिख दूँ...



                           कुछ लिख दूँ...

1.
कभी-कभी सोचता हूँ कि,
एक कविता बस यूँ ही लिख दूँ।
सारी की सारी तारीफें लिख दूँ,
जुल्फें आँखे होंठ गर्दन और तिल।
सब कुछ स्मृतियों में उतारू ,
और फिर तेरा रूप कागज़ पर रख दूँ।
लिख दूँ दिल की वो सारी बातें ,
जो मैं तुझसे कभी कह ही न पाया।
एक एहसास था दिल में,
जो कभी लबों तक न आया।
पहली मुलाक़ातें तेरी बातें,
मेरा इकरार तेरा इनकार लिख दूँ।
मुझ जैसे कई और हैं चाहने वाले तुम कहती थी
फिर भी लिख दूँ तुमको पहला प्यार लिख दूँ।

2.
याद है वो कोचिंग के दिन,
जब तुम मुझसे मदद लेती थी।
किसी सवाल को हल करने के बहाने,
छुपके से उन गोरे हाथों को छू लेता था।
सच कहता हूँ बस एक वो ही दिन थे,
जब मैं भी किसी को ईश्क़ कर लेता था।
है पता वो बस मतलब के दिन थे,
कुछ पल ही थे पर बेहद हसीन थे।
तुम मुझसे कुछ सवाल सीख लेती थी,
मैं तुमको देख नीत नए ख्याल लिख लेता था।

3.
कई बार खूब व्यस्त रहकर भी,
तुझको अहमियत दी थी।
बेमतलब से एक लगाव को भी,
हमने इतनी खासियत दी थी।
एक झलक तेरी देखने को,
तुझको पढ़ाना पड़ता था।
हाय रे कमबख्त ईश्क़,
नौटंकी उठाना पड़ता था।
पर अब खुशी होती है,
किसी के लिए हम भी अजीज थे।
शायद एक उम्मीद थे मीत थे
कुछ न थे पर हर मतलब में करीब थे।


(कुछ ख्यालों को यूँ ही लिख लेना चाहिए। स्मृतिपटल पर चलते कुछ रंगीन नजारों को शब्दों में पिरोकर एक कविता की माला गूंथ ईश्वर को भेंट कर देना भी भक्ति का ही स्वरूप है।)


Monday, 25 April 2022

मैंने देखा है...


                             मैंने देखा है...
मैंने देखा है...
बाप बेटे को दुश्मन होते,
भाई भाई को खून पीते।
सम्बंधो को मरते देखा है,
माँ बेटी को लड़ते देखा है।
रिश्तों में वेहसियत देखी है,
सबकी हैसियत देखी है।
सबने सबको लुटा है,
हर रिश्ता यहाँ झूठा है।
एक टुकड़ा जमीन कुछ रुपये,
और अपनी हवस को ही रटते देखा है।
सारे भौतिक सुखों के लिए,
सम्बंधो की तुरपाई को फटते देखा है।
जवानी को नशे में मस्त देखा है,
जीवन सारा अस्त व्यस्त देखा है।
शिक्षा का अभाव देखा है,
गरीबी का प्रभाव देखा है।
झुग्गी झोपड़ी देखी है,
शैतानी खोपड़ी देखी है।
जीवन के कई रंग देखे हैं,
सच्चे झूठे सारे प्रसंग देखे है।
हंसते हंसते एकदम से रोया हूँ,
खुशियों की तलाश में खोया हूँ।
उम्र छोटी है पर कई धूप छांव देखे हैं,
लड़खड़ाते अपने भी पांव देखे हैं।
कुछ आपबीती है कुछ बितनी है,
जिंदगी एक जंग है और जंग जितनी है।
                                               :- संदीप प्रजापति


(अपनी वेदनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को किसी माध्यम की आवश्यकता होती है।  संगीत, नृत्य, चित्रकारी या कला का कोई भी स्वरूप वेदनाओं और भावनाओं को प्रकट करने का सबसे उत्तम मार्ग होता है। लेखनी इनमें से ही एक प्रकार है, जो कि व्यक्ति को वो सारी स्वतन्त्रता देती है। व्यक्ति जो कुछ प्रत्यक्ष रूप से सहज नहीं महसूस कर सकता उसे वह अपने लेखन के माध्यम से सहज ही व्यक्त कर सकता है।)
  

Wednesday, 20 April 2022

तुम आना जरूर...

                            तुम आना जरूर...

सुनो,
आओगी जब तुम
लेते आना मेरी उन सारी खुशियों को,
जो मैंने तुम्हारे आश में 
तुम पर उधार रखे हैं। 
उन सारी खामोशियों की वजह लेते आना,
जिन्हें मैं बेवजह ही ढो रहा हूँ।
हर उस दर्द का मरहम बनकर आना,
जो मैंने हर किसी से छिपाए हैं।
हर उस उम्मीद की सच्चाई बनकर आना,
जो मैंने तुमसे लगाए हैं।
के मेरे सारे त्यागों प्रतिक्षाओं का, 
तुम हिसाब बन कर आना।
एक वक्त होगा इश्क़ मेरा, 
तुम बेहिसाब बन कर आना।
आना ऐसे की जैसे, 
आती है तुम्हारी स्मृति।
आकर छा जाना मेरे मानस पर
जैसे किसी मरुस्थल में छाती हो वृष्टि।
सुनो, तुम आओगी ना?
सारे ख्वाबों को सच कर जाओगी ना?
न आ सको तो तुम मत आना,
परन्तु आकर फिर न जाना।
मरु को बंजर ही रहने देना
पर झूठा प्रेम उपवन न लगाना।
                                           
                                                :- संदीप प्रजापति

( हिंदी साहित्य जगत में प्रेम रस का अपना एक विशेष महत्त्व है। प्रेम रस की विधा और प्रेम की क्षुधा को जीने का कविताओं से बेहतर कोई दूसरा विकल्प खोज पाना तो शायद ही मुमकिन हो। यह कविता उन सभी हिंदी भाषी पाठक को समर्पित है, जो जीवन में प्रेम की आश को छोड़ना नहीं चाहते।और हाँ शायद छोड़ना भी नहीं चाहिए। क्या पता कब जीवन करवट ले और आपके हिस्से भी प्रेम आ जाए। राधा, रुक्मिणी वाला न सही पर मीरा वाला तो आ ही जाए।)  

Saturday, 26 March 2022

जीवटता की ओर...

संघर्षो से मत भाग तू, अब तो प्यारे जाग तू। उम्र हुई जवानी की, करतब कर दिख लाने की। कभी कभी यात्राएं हमें ऐसे व्यक्तियों से मिलाती है। जिनसे मिलकर या उन्हें देखकर हमारा जीवन जीने का हौसला बढ़ जाता है। उनकी जीवटता के सामने हमारे तकलीफ और अकर्मण्यता कितने तुच्छ हैं, यह हमें तब प्रतीत होता है जब हम अपने सामने ही किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जो हमसे भी दयनीय स्थिति में हो फिर भी जीने की ललक न छोड़े। ऐसे लोगों का दिखना कोई संयोग नहीं। ईश्वर इन्हें पूर्वनियोजित तरीके से हमारे सम्मुख उपस्थित करता है, जिससे हम खुद के रुके हुए जीवन में हौसला फूंक सकें। किसी मासूम बच्चे का खिलौने बेचते हुए दिख जाना, किसी विकलांग व्यक्ति द्वारा कोई कलाकृति करना या किसी एकल माँ द्वारा अपने शिशुओं के पालन के लिए सँघर्ष करना। सफर के दौरान ऐसे व्यक्तियों से आए दिन हम अवगत होते हैं। आपने गौर किया हो या न पर शायद इनके जीवन में हमसे अधिक संघर्ष होने के बावजूद ये लोग जीवन को चुनौति देते हैं और जीने की लालसा बरकरार रखते हैं। क्या इन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं होती या इन्होंने इसे ही जीवन मान लिया है। निराशा मनुष्य का जीवन के आनंद से नाता तोड़कर उसे आत्महत्या की ओर उकसाती है, इसीलिए हमें चाहिए कि हम किसी भी परिस्थिति में निराश न हो। अगर अथाह परिश्रम के बाद भी हमें असफलता ही हाथ लग रही है तो भी हमें निराश न होकर प्रयत्न करते रहना चाहिए। हो सकता है ईश्वर हमसे कुछ और अधिक बेहतर करवाना चाह रहे हों। इसीलिए कहा भी गया है :- मन का हो तो अच्छा, मन का न हो तो और भी अच्छा। क्योंकि वो ईश्वर के मन का होता है और ईश्वर किसी का बुरा नही चाहते। हम - आप जैसे लोग जीवन में आने वाली हर छोटी - छोटी तकलीफों से निराश हो जाते हैं तथा अपनी जिंदगी और ईश्वर को कोसने लगते हैं। क्या बगैर मुश्किलों के जीवन में सुख का अनुभव कर पाना सम्भव है? जब तक जीवन में संघर्ष नहीं होगा तब तक हमें परिश्रम का महत्त्व और सफलता का स्वाद समझ नहीं आ सकता। इसीलिए जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए एक योद्धा के भांति लड़कर विजय प्राप्त करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। :- संदीप प्रजापति

एक संगिनी

एक संगिनी तुम्हारा मिलना  जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...