Saturday, 26 March 2022

जीवटता की ओर...

संघर्षो से मत भाग तू, अब तो प्यारे जाग तू। उम्र हुई जवानी की, करतब कर दिख लाने की। कभी कभी यात्राएं हमें ऐसे व्यक्तियों से मिलाती है। जिनसे मिलकर या उन्हें देखकर हमारा जीवन जीने का हौसला बढ़ जाता है। उनकी जीवटता के सामने हमारे तकलीफ और अकर्मण्यता कितने तुच्छ हैं, यह हमें तब प्रतीत होता है जब हम अपने सामने ही किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जो हमसे भी दयनीय स्थिति में हो फिर भी जीने की ललक न छोड़े। ऐसे लोगों का दिखना कोई संयोग नहीं। ईश्वर इन्हें पूर्वनियोजित तरीके से हमारे सम्मुख उपस्थित करता है, जिससे हम खुद के रुके हुए जीवन में हौसला फूंक सकें। किसी मासूम बच्चे का खिलौने बेचते हुए दिख जाना, किसी विकलांग व्यक्ति द्वारा कोई कलाकृति करना या किसी एकल माँ द्वारा अपने शिशुओं के पालन के लिए सँघर्ष करना। सफर के दौरान ऐसे व्यक्तियों से आए दिन हम अवगत होते हैं। आपने गौर किया हो या न पर शायद इनके जीवन में हमसे अधिक संघर्ष होने के बावजूद ये लोग जीवन को चुनौति देते हैं और जीने की लालसा बरकरार रखते हैं। क्या इन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं होती या इन्होंने इसे ही जीवन मान लिया है। निराशा मनुष्य का जीवन के आनंद से नाता तोड़कर उसे आत्महत्या की ओर उकसाती है, इसीलिए हमें चाहिए कि हम किसी भी परिस्थिति में निराश न हो। अगर अथाह परिश्रम के बाद भी हमें असफलता ही हाथ लग रही है तो भी हमें निराश न होकर प्रयत्न करते रहना चाहिए। हो सकता है ईश्वर हमसे कुछ और अधिक बेहतर करवाना चाह रहे हों। इसीलिए कहा भी गया है :- मन का हो तो अच्छा, मन का न हो तो और भी अच्छा। क्योंकि वो ईश्वर के मन का होता है और ईश्वर किसी का बुरा नही चाहते। हम - आप जैसे लोग जीवन में आने वाली हर छोटी - छोटी तकलीफों से निराश हो जाते हैं तथा अपनी जिंदगी और ईश्वर को कोसने लगते हैं। क्या बगैर मुश्किलों के जीवन में सुख का अनुभव कर पाना सम्भव है? जब तक जीवन में संघर्ष नहीं होगा तब तक हमें परिश्रम का महत्त्व और सफलता का स्वाद समझ नहीं आ सकता। इसीलिए जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए एक योद्धा के भांति लड़कर विजय प्राप्त करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। :- संदीप प्रजापति

Wednesday, 23 March 2022

भाग्य

                                    भाग्य

    

क्यों तू कोषे भाग्य को

बना कर्म को पतवार,

कूद संघर्षों के दरिया में

दे अस्तित्व को ललकार।

      कितना आसान होता है न? अपनी नाकामी को भाग्य का दोष दे देना। कह देना की मैंने कोशिश बहुत की मगर यह तो मेरी किस्मत में ही नहीं था। अगर भाग्य ने साथ दिया होता तो आज मैं भी कुछ होता।
     पर क्या सच में सफलता के लिए कर्मों के अलावा भाग्य का भी उतना ही महत्व है जितना कि कर्मों का है?
क्या सच में भाग्य के बिना कोई सफल या महान नहीं हो सकता? क्या एक भाग्यविहीन व्यक्ति सफल नहीं हो सकता? हाँ माना कि भाग्यशाली होना अच्छी बात है, जिससे जीवन में सफलता आसानी से प्राप्त हो सके। परन्तु मनुष्य को चाहिए की सदा भाग्य के भरोसे ही न बैठा रहे। उसे कर्मों यानी कि परिश्रम की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। भाग्य साथ दे न दे लेकिन कर्म जरूर साथ देंगे। एक कर्मविहीन व्यक्ति के सफल होने की संभावना बहुत कम ही हो सकती है, परंतु किसी कर्तव्यपरायण और कर्मठ व्यक्ति के सफल होने की सम्भावना निश्चित ही है।

Saturday, 5 March 2022

त्रिवेणी संगम : एक अविस्मरणीय यात्रा

त्रिवेणी संगम : एक अविस्मरणीय यात्रा


मैं हिंदू मेरे हिंदुत्व का परचम हो तुम।

मैं प्रयाग मेरे तीर्थराज का संगम हो तुम।।

                                                    :-संदीप प्रजापति



आज मैं आपको इन पंक्तियों के लिखने का कारण बताऊँगा,जिसको जीना अपने आप में ही गर्व है।

     यों तो हम जीवनभर कई यात्राएँ करते हैं। जिनमें से कुछ पूर्वनिर्धारित होती हैं तो कुछ आकस्मिक। कुछ यात्राएँ हमें याद ही नहीं रहती तो वहीं कुछ यात्राएँ हमें जीवन भर याद रहती है और जीवन के सुंदर होने का एहसास करवाती हैं। मैं आपको एक ऐसी ही अविस्मरणीय यात्रा का वृत्तांत इस ब्लॉग के माध्यम से साँझा करने जा रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप इस ब्लॉग के माध्यम से ही इस अलौकिक स्थान के सुंदरतम दर्शन सुलभ ही कर पाएँगे।


       वैसे तो समाज की मान्यता के अनुसार और सुरक्षा की दृष्टि से यात्राएँ परिजनों के साथ समूह में ही करनी चाहिए ताकि किसी भी यात्रा का आनंद दोगुना हो जाए। परंतु मेरे लिए यह केवल अपवाद मात्र है। यदि आप एकल यात्रा को चुनते हैं तो आप अत्यधिक जिम्मेदार, जागरूक, निडर और साहसी बनते हैं। साथ ही साथ आपको आपका संपूर्ण समय केवल अपने लिए अपनी इच्छानुसार जीने का मौका मिलता है तथा प्रकृति माता द्वारा अत्यधिक ज्ञान अर्जित करने का अवसर प्राप्त होता है।


       तो चलिए हम अपने ब्लॉग की ओर चलते हैं। आज मैं आपको भारत के तीर्थराज यानी प्रयागराज ले चल रहा हूँ। वैसे तो पौराणिक हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह नगर अत्यधिक पवित्र और खास अहमियत रखता है। हिंदू धर्म में इस जगह का महत्व और उल्लेख मिलता है। उत्तरप्रदेश राज्य में बसा यह नगर पूरे भारत से जुड़ा हुआ है। प्रयागराज में त्रिवेणी या संगम क्षेत्र यहाँ की सबसे सुंदर जगह है। मान्यता के अनुसार यहीं पर तीन पवित्र नदियों गंगाजी, यमुनाजी और सरस्वतीजी का मिलन होता है। जिसके कारण ही इसका नाम त्रिवेणी या संगम पड़ा। यहीं पर पापनाशिनी माँ गंगा मनुष्य के पापों को नष्ट करती है।


         संगम पर भक्तों और श्रद्धालुओं का तांता साल भर लगा रहता है। लेकिन कुछ प्रमुख त्योहारों और कुम्भ मेलों पर यहाँ होने वाली भीड़ का कोई सानी नहीं। प्रत्येक १२ वर्ष में यहाँ पर महाकुम्भ मेले का आयोजन होता है। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ष माघ मेले का भी आयोजन होता है। जिसमें श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं। इस वर्ष माघ मेले में मैंने भी संगम आने का निश्चय किया और गंगा मईया की कृपा से उनके दर्शन भी हुए। प्रयागराज में जैसे ही आप शास्त्री ब्रिज से संगम का विहंगम दृश्य देखते हैं एक क्षण के लिए खुद को पृथ्वी का सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति समझने का गौरव होना कोई अचरज नहीं। लाखों की संख्या में मनुष्यों का जमावड़ा, न जाने कितने सारे छोटे छोटे अस्थायी झोपडें, साधु-संत-महात्मा, भक्तिमय वातावरण, आरती-पूजा, शंखनाद, भजन इत्यादि आपको अपनी ओर आकर्षित करेंगे ही।

 

       संगम को जी भर जीने के लिए आपको कम से कम एक दिन-रात की आवश्यकता पड़ती है और एक स्थाई जगह जहाँ आप ठहर सकें। संगम पहुँचते ही मैं सबसे पहले बड़े हनुमान मंदिर, लेटे हुए हनुमान मंदिर और श्री आदि शंकर विमान मण्डपम मंदिरों में ईश्वर के दर्शन के लिए गया। जिससे मुझे ईश्वर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री आदि शंकर मण्डपम की रचना शैली, भव्यता और सुंदरता ने तो मन ही मोह लिया था। और तो और इस मंदिर के ऊपरी मंजिले से पूरे संगम का अलौकिक दृश्य देखना किसी स्वप्न से कम नहीं। दूर दूर तक जगमगाती लाईटें, ब्रिज, गंगा मईया, भक्तिमय वातावरण, ठंडी हवाएं, इलाहाबाद फोर्ट और तिरंगा। आहा...।


         मंदिरों के दर्शन के बाद मैं वहाँ से निकलकर गंगा जी के दर्शन, आरती और स्नान के लिए गया। संगम की बलुई मिट्टी, गंगा जी की कलकल की ध्वनि, घाटों की सुंदरता और नाव, पानी में तैरते दीप, गंगाजल के डिब्बे, इत्यादि मन को आल्हादित कर देते हैं। गंगा जी के दर्शन कर मैं गंगा आरती का साक्षी बना। फिर मैंने गंगा जी में स्नान कर जाने-अनजाने हुए पापों के लिए क्षमा याचना की और सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इतनी ठंड रात में गंगा जी में स्नान करना आसान तो नहीं पर जहाँ श्रद्धा,आस्था और भक्ति हो वहाँ कुछ मुश्किल नहीं होता। चारों तरफ भक्ति का वातावरण, हर कोई धार्मिक कर्मकांड करते हुए नजर आना, अपने परिचितों का अंतिम संस्कार, मुंडन, इत्यादि कितना कुछ देखने और सिखने को मिला। शायद किसी अच्छे कर्म के कारण ही इन सब का साक्षी होने का मौका मुझे मिला। सारे धार्मिक कर्म करने के पश्चात कुछ देर शांति से गंगाजी के पास बैठना परम् सुख की अनुभूति करवाता है।



      इसके बाद मैंने मेले की ओर रुख किया। मेले की रौनक देखते ही बनती थी। तरह तरह की धार्मिक और घरेलू वस्तुएं , पहनने-ओढ़ने  की चीजें, खाद्यपदार्थों के स्टाल कितना कुछ था। हालांकि मुझे मेले में अत्यधिक रुचि नहीं सो मैं वहाँ से निकल गया। अरे हाँ, मैं तो 'नमामि गंगे' और 'रामायण जी' के ऐतिहासिक प्रदर्शनी के बारे में बताना ही भूल गया। यहाँ पर आयोजित प्रदर्शनी जिसमें 'नमामि गंगे प्रोजेक्ट' और 'रामायण जी' को बहुत ही सुंदर और वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत किया गया था इस प्रकार की प्रदर्शनी का आयोजन करना युवा वर्ग को भारत से रूबरू करवाने के लिए आवश्यक है।



       संगम से ब्रिज को देखते ही कुछ पंक्तियां याद आने लगती है:

एक जंगल है तेरी आँखों में

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।

तू किसी रेल-सी गुजरती है

मैं किसी पूल-सा थरथराता हूँ।


और हाँ सुना है कि संगम दो बार आना चाहिए। तो देखते हैं दुबारा कब बुलावा आता है।

      संगम में इतना कुछ है कि जिसको लिखना मेरे बस का नहीं। इसीलिए कहूंगा कि संगम को अनुभव करना होगा और जीना होगा।


      अंत में उन मित्रों का सहृदय धन्यवाद जिन्होंने अपने पास ठहरने की उचित व्यवस्था प्रदान की और स्वनिर्मित स्वादिष्ट भोजन से आतिथ्य किया। उनके आतिथ्य का सदा ऋणी रहूंगा।

(नोट:- सभी से एक आग्रह है। यदि आपको धर्म में आस्था न हो तो भी एक बार इस प्रकार की जगह पर जरूर जाएं। इस तरह की जगहों का संबंध केवल धर्म से जोड़ना उचित नहीं। इन जगहों पर जीवन जीने की कला का दर्शन होता है। जिससे आप अपने जीवन को एक नई दिशा दे पाएंगे।)


Friday, 25 February 2022

युद्ध या प्रेम : कौन श्रेष्ठ

                      युद्ध या प्रेम : कौन श्रेष्ठ


युद्ध और प्रेम में कौन श्रेष्ठ है? युद्ध या प्रेम! यूँ तो श्रेष्ठ वही हो सकता है जो अड़िग, अटल और सत्य हो। जो स्वभाविक हो जिसमें किसी प्रकार का छल, हिंसा या शक्ति प्रयोग न हो। प्रेम तो एक अनादि सत्य है जो किसी न किसी रूप में सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक रहेगा। जिसका होना मानव जीवन के लिए वरदान है,  जिसके बिना ये सृष्टि सुनी है। पर युद्ध का क्या? क्या यह किसी भी रूप में मानव सभ्यता के लिए हितकारी है? केवल सत्ता, शक्ति, महत्ता इत्यादि के लोभ में युद्ध उत्पन्न करना और मानवीय सभ्यता का नाश करना कहाँ तक उचित है। युद्ध कुछ दलों के बीच का प्रसंग हो सकता है, परन्तु इसका परिणाम सम्पूर्ण संसार को झेलना होता है। संसार की प्रगति को पीछे की ओर धकेलना, गरीबी, भुखमरी और अराजकता ही युद्ध की देन हो सकती है। जबकि प्रेम तो मनुष्य का मनुष्य से अनादि काल तक का संबंध जोड़ती है। कहीं दिलों से दिलों को तो कहीं देशों को देशों से जोड़ती है। विकल्प भी हमारे ही हाथों में है हमें युद्ध चाहिए या प्रेम।

Monday, 24 January 2022

अयोध्या जी : श्रीरामजन्म भूमि

               अयोध्या जी : श्रीरामजन्म भूमि


अयोध्या जी... कितना सुंदर और अलौकिक है ना यह नाम? नाम मात्र से ही जीवन में एक आशा दौड़ जाती है। हिंदू धर्म में आध्यात्मिकता का एक प्रमुख केंद्र, तीर्थ स्थल, सर्व पूरियों में विशिष्टता रखती यह 'अयोध्या पूरी' कई सालों से हिंदुओं के आस्था का केंद्र बनी हुई है। अनेकों बार बसने-उजड़ने की कहानी संजोए, कई आक्रमण झेले हुए आज भी यह नगरी अपनी प्राचीनता और भव्यता सहित विराजमान है। जिसके कण-कण में प्रभु 'श्रीराम' बसते हैं। सालों से विवादों में घिरे होने के बावजूद यह नगरी और नगरवासी आज भी 'रामराज्य' की संकल्पना में जीते हैं। अवध क्षेत्र में रहते प्रत्येक नगरवासी के मुख से आज के युग में भी चारों पहर 'राम नाम' ही सुनने को मिलना राम जी के प्रति उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का ही परिणाम है।

इस नगरी के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व को देखते हुए देश-विदेश से लाखों दर्शनार्थी और पर्यटक यहाँ आते हैं और जीवन से जुड़े रहस्यों को भी समझने की कोशिश करते हैं। क्योंकि जीवन की व्याख्या धर्म से बेहतर शायद कहीं और नहीं मिल सकती। तो आइए आज हम भी चलते हैं 'अयोध्या जी'। अयोध्या जी यह भारत के उत्तरप्रदेश राज्य में बसी नगरी है। जो की यातायात के सभी साधनों से जुड़ी हुई है, जिसके कारण आप भारत के किसी भी हिस्से से यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। यहाँ आने की यात्रा भी अपने आप में उल्लासपूर्ण होती है। एक बार अयोध्या नगरी में पहुंचने के बाद आपको चारों तरफ साधु-महात्मा और पंडितों का तांता लगा हुआ दिखेगा। जिनमें से कुछ पंडित तो केवल लुटेरों के भांति ही होते हैं। और हाँ यहीं से शुरू होती है आपके अयोध्या दर्शन की यात्रा। आप यहाँ से कई आकर्षक घाटों, मंदिरों, धार्मिक स्थलों के दर्शन कर सकते हैं।


मान्यता के अनुसार अयोध्याजी में प्रवेश करते ही आपको सबसे पहले हनुमान गढ़ी में हनुमान जी के दर्शन करने चाहिए और उनकी आज्ञा से अयोध्या नगरी और रामजन्मभूमि क्षेत्र व रामलला के दर्शन करने चाहिए। तो आइए हम चलते हैं हनुमान गढ़ी मंदिर। यह मंदिर एक टीले पर बसा है। मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए लगभग ७६ सीढ़ियों को चढ़ना होता है, जिससे हनुमान जी के भव्य दर्शन प्राप्त हो सकें। मंदिर के प्रांगण से हनुमान जी की प्रतिमा के अलौकिक दर्शन होना बेहद सुखद अनुभव होता है। यह मंदिर मानसिक शांति और आध्यात्मिकता का केंद्र है। इसके बाद हम क्रमशः कनक भवन, दशरथ महल, सीताजी की रसोई, इत्यादि के भी दर्शन कर सकते हैं और इन महलों, भवनों की भव्यता को देखकर आनंद का अनुभव करते हैं। यहाँ के इन महलों, भवनों और मंदिरों की स्थापत्य कला भी अपने आप में काफी अद्भुत है।


अब हम चलते हैं रामलला के दर्शन करने जिसकी शुरुआत होती है रामजन्मभूमि क्षेत्र से। जहाँ जाने के लिए आपको घंटों कतार में लगना होगा और सुरक्षा कारणों से आपकी सभी वस्तुएं जमा करानी होगी। रामलला के जयकारे की गूंज के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में आप जन्मभूमि क्षेत्र तक पहुंचते हैं। जहाँ आपको भव्य मंदिर निर्माण के कार्यों, नींव स्थल, आकर्षक स्तंभों, खंभों इत्यादि के दर्शन होते हैं। हालांकि भव्य मंदिर निर्माण कार्य अभी चल ही रहा है, जिससे आपको मंदिर के दर्शन नहीं होते। कुछ आगे बढ़ने पर आपको रामलला की प्रतिमा के दर्शन होंगे जिसकी स्थापना राममंदिर में होगी। रामलला की प्रतिमा के दर्शन करना ही जैसे त्रेता के साक्षात राम के दर्शन हो जाने के स्वरूप है। राम जी के दर्शन से सुख-शांति और आनंद की प्राप्ति होने के पश्चात आप अयोध्या जी में बसे अनेकों घाटों और सरजू मईया के दर्शन के लिए जा सकते हैं।

घाटों में सुप्रसिद्ध नयाघाट, अयोध्या जी के प्रमुख घाटों में से एक है। यहाँ घाट पर स्नान-ध्यान, मुंडन, अंतिम-संस्कार, इत्यादि धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं। घाट से ही आप सरजू मईया के पावन जल में स्नान कर अपने आप को दोष मुक्त करने का प्रण ले सकते हैं। पर्यटन की भावना से आए हुए लोगों के लिए यहाँ नौकाविहार एक अच्छा विकल्प हो सकता है। नौकाविहार से आप सरयू नदी के मध्य में जाकर अयोध्या नगरी में बसे घाटों के विहंगम दृश्य को देख सकते हैं, इन्हीं घाटों पर नित आरती होती है। जिसका साक्षी होने के लिए प्रत्येक दर्शनार्थी इच्छुक होता है। घाटों की इस शृंखला में झुनकी घाट, तुलसी घाट, राजघाट, इत्यादि भी प्रमुख हैं।

घाटों की पूजा-अर्चना और धार्मिक कर्मकांडों का अनुभव करने के पश्चात आप 'राम की पैड़ी' जा सकते हैं। कहते हैं अयोध्या जी आए और 'राम की पैड़ी' न देखा, तो आपने कुछ न देखा। 'राम की पैड़ी' पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया गया एक बहुत ही सुंदर स्थल है। जहाँ जल की धारा के एक ओर भव्य एवं प्राचीन इमारत और मंदिर स्थित हैं तो दूसरी ओर पर्यटकों के लिए सूंदर पार्क, उद्यान इत्यादि है। पिछले कुछ वर्षों से इसी 'राम की पैड़ी' पर विश्व प्रसिद्ध भव्य "दीपोत्सव" का भी आयोजन किया जाता है। 'राम की पैड़ी' की सुंदरता को देखते हुए यहाँ कुछ हद तक छात्र-छात्राएं और प्रेमी युगल भी समय बिताने के लिए आते रहते हैं। यहाँ आस-पास में कुछ स्टॉल और छोटे-छोटे फेरीवाले पर्यटकों की जरूरतों के उपयुक्त सामान बेचते हुए देखे जा सकते हैं। पर्यटन के विषय हेतु अयोध्याजी में 'राम की पैड़ी' सबसे सुंदरतम स्थान है। हालांकि संपूर्ण अयोध्या जी का धार्मिक महत्त्व तो है ही। साथ ही साथ पर्यटन का भी महत्व है। इन सब के अलावा अयोध्या जी में प्राचीन घरों को देखना भी अद्भुत है। जिनकी अवस्था अब बिल्कुल जीर्ण हो चुकी है। इनमें से कुछ तो खंडहर की भांति प्रतीत होते हैं। यूँ तो अयोध्या जी का वर्णन करने को तो शब्द ही कम पड़ जाए और लेख समाप्त ही न हो। परन्तु इस लेख की लंबाई आवश्यकता से अधिक न हो जाए इसलिए लेख को यहीं समाप्त करना पड़ रहा है।


तो कैसी लगी आपको यह अयोध्या जी के दर्शन की यात्रा। आशा करता हूँ कि इस लेख के माध्यम से आपको भी अयोध्या नगरी, रामलला, राम की पैड़ी और अनेकों घाटों के दर्शन का अनुभव और रस प्राप्त हुआ होगा। अपने विचार और अनुभव कमेंट्स में साँझा करें। प्रभु श्रीराम  सबका मंगल करें।
जय श्रीराम🚩

Monday, 17 January 2022

"प्रेम मंजिल नहीं, यात्रा है। पाना नहीं, जीना है।"

        "प्रेम मंजिल नहीं, यात्रा है। पाना नहीं, जीना है।"

         प्रेम में पड़ा व्यक्ति यात्री हो जाता है। एक ऐसे राह का यात्री जिसकी कोई मंजिल न हो। केवल चलते ही जाना है,प्रेम डगर का मुसाफिर हुए रहना है। सच्चे प्रेम में पड़े पुरूष को कुछ हद तक तो मंजिल की चाह होती भी नहीं है, क्योंकि प्रेम अपने आप में ही एक मंजिल की भांति है। आपके हृदय में किसी के प्रति निःस्वार्थ प्रेम का भाव उत्पन्न होना ही प्रेम की मंजिल है। प्रेम का भाव उन्ही हृदयों में वास करता है, जो प्रेम को भक्ति,साधना या श्रद्धा के स्वरूप में देखता हो। क्योंकि प्रेम को काम रूप में देखता पुरुष,प्रेम कभी नहीं जी सकता। वह काम की प्राप्ति चाहे कितनी ही कर ले परन्तु भाव-विभोर कर देने वाला प्रेम कभी नहीं पा सकेगा। वह अपने पौरुष के बल से प्रकृति(स्त्री) को उत्तेजित तो कर सकता है, पर उसका प्रेम रूपी आशीर्वाद नहीं पा सकता। प्रेम की यही व्याख्या सामान्यतः स्त्रियों पर भी लागू होनी चाहिए। केवल दैहिक सौंदर्य के होने मात्र से वे अनेकों पुरुषों का शारीरिक और आर्थिक भोग तो कर सकेंगी परंतु एक आदर्श पुरुष का प्रेम नहीं पा सकेंगी। केवल उपभोगवाद से इच्छाएँ और ऐंद्रिक तृप्ति हो सकती है। आत्मीय तृप्ति के लिए स्त्री अथवा पुरुष को चाहिए कि उसे एक वास्तविक प्रेम की प्राप्ति हो। 
      यहाँ प्रेम का अर्थ केवल स्त्री-पुरुष प्रेम नहीं होना चाहिए। प्रेम संसार की एक अलौकिक शक्ति है, जिसके माध्यम से मनुष्य किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। मनुष्य जिस किसी से भी सम्पूर्ण प्रेम करेगा। वह उसे हासिल कर सकेगा। चाहे वह कोई व्यक्तिगत प्रेम हो स्त्री या पुरुष। चाहे स्वयं ईश्वर ही क्यों न हो, मनुष्य प्रेम की शक्ति से उन्हें भी प्राप्त कर सकता है। संसार में ऐसे कई साक्षात उदाहरण मौजुद हैं,जिन्होंने अपने प्रेम के बल से ईश्वर की प्राप्ति की है।
प्रेम को भक्ति में रूपांतरित कर तुलसीदास जी और बालक ध्रुव ने भी हरि चरणों की प्राप्ति की है। अपने लक्ष्यों के प्रति अथाह प्रेम से ही कई महापुरुषों ने सफलता पाई है और  इतिहास रचे हैं। प्रेम ही संसार का एकमात्र सबसे प्राचीन और अनन्त भाव हो सकता है, जिसका अंत होना नामुमकिन है। क्योंकि यदि प्रेम के भाव का अंत हो गया तो संसार का भी अंत निश्चित हो सकता है। प्रेम में तो विष को अमृत करने देने की शक्ति होती है।

इसी के संदर्भ में कबीरदास जी कहते हैं :-
१.
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।
२.
प्रेम पियाला जो पिए शीष दक्षिणा देय,
लोभी शीष न दे सके नाम प्रेम का लेय।

(यह लेखक की व्यक्तिगत विचारधारा है। प्रत्येक का मद और विचार भिन्न हो सकता है। आप अपनी राय जरूर कमेंट्स में बताए।)


Monday, 10 January 2022

ईश्वरीय आकर्षण और विकर्षण के सिद्धांत

जीवन में जाना कहां है, यह आपको ही तय करना है।

          अस्तित्व में आकर्षण और विकर्षण का भाव सन्निहित है। इसे विज्ञान की भाषा में गुरुत्वाकर्षण कहा गया है। यह आकर्षण केवल धरतो ग्रह और मनुष्य में हो नहीं होता। यह हमारी प्रकृति और अस्तित्व का भी केंद्रीय भाव है। ईश्वरीय चेतना में यह दोहरा भाव होता है। गुरुत्वाकर्षण एक ओर का चिाव नहीं है, बल्कि दो वस्तुओं के बीच का खिंचाव है। गुरुत्वाकर्षण के नियम को ठीक से समझ लेते हैं तभी ईश्वरीय खिंचाव या आकर्षण को सही तरीके से समझ सकते हैं।

             चांद और पृथ्वी के संदर्भ में पृथ्वी की शक्ति ज्यादा है तो वह वस्तुओं को अपनी और ज्यादा तेजी से खींच पाती है। हर दो वस्तुओं में आकर्षण और उसमें एक दूसरे को अपनी ओर खींचने या आकर्षित करने की इच्छा सन्निहित होती है। जीवन में प्रत्येक चीज इंद्र के बिना घटती नहीं है। जैसे कि पेड़ से फल नीचे गिरता है, उसी प्रकार पेड़ पर फल और फूल भी आते हैं। न्यूटन के समकालीन चिंतक रस्किन ने इस पर सवाल उठाया कि आखिर यह किस कारण से आते हैं। ये ऊपर कैसे पहुंच जाते है? इतना ही नहीं बांस और ताड़ जैसे पांच सौ फोट लंबे पेड़ों पर ऊपर पत्तियों में जल कैसे पहुंचता है?

             ईश्वर अपने अनुग्रह से अनुगृहित करने के लिए नदी बनते हैं, ताकि उसके समीप आनेवालों को जल रूपी अमृत का पान करा सकें। कभी वह पर्वत बन जाते हैं ताकि प्रेम के शिखर का दर्शन करा सकें, प्रेम की विशालता के लिए सागर बन जाते हैं। फिर उस ईश्वर का दैवीय प्रेम अनंत आत्माओं के हृदय में क्रियाशील होकर धड़कता रहता है। ईश्वर का प्रसाद फूलों में सुगंध, पक्षियों में कलरव, दूसरों के हृदय में प्रेम को बढ़ाता है तो उसका अनुग्रह प्रकट होता है। सुबह से रात में सोने तक ईश्वर का प्रसाद मिलता है लेकिन यह सूक्ष्म और रहस्यमय होता वह प्रतिदिन भोजन से मोस, रक्त, मज्जा, हड्डी और मस्तिष्क का निर्माण करता है, हमारा विकास करता है। लेकिन हम समझते हैं कि भोजन के कारण ही हम जीवित है।

             सृष्टि में आकर्षण का नियम अंतनिहित है। जब दो वस्तुएं हिलने के लिए स्वतंत्र हो और ये एक दूसरे की ओर खिंचे तो गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव दिखाई देता है। भौतिक विज्ञान को परिभाषा बताती है कि गुरुत्वाकर्षण यह शक्ति है जो दो भौतिक पिंडों के बीच होती है और जिसके कारण प्रत्येक पिंड दूसरे पिंड को एक-दूसरे की ओर खींचते हैं। यह नियम सार्वभौमिक है। पृथ्वी सूर्य तथा आकाश सहित सभी वस्तुओं में समान रूप से यह बल होता है। इस कारण आकाश के सूर्य, चंद्र, तारे और अन्य खगोलीय पिंड एक-दूसरे के इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते हैं और अपनी और दूसरे पिंडों को भी खींचते हैं। बाद में वैज्ञानिकों ने खोज कर निकाला कि नीचे खींचने की शक्ति प्रैविटेशनल फोर्स है जबकि ऊपर खींचने की शक्ति लैविटेशनल फोर्स है। अध्यात्म में संतों ने इस शक्ति को प्रसाद कहा।

          ठीक इसी प्रकार ईश्वर अपनी अनंत चेतना के प्रसाद के माध्यम से अपनी ओर खींचते हैं, तो दूसरी ओर माया यानी हमारी अज्ञानता दूसरी ओर खींचती है। मुहता कारण हम ईश्वरीय आकर्षण के विभिन्न केंद्रों की उपेक्षा करते हैं और अपने को नीचा गिराते हैं। हम अपनी इच्छाओं और ऐट्रिक सुख के करण जन्म-मरण के अनंत चक्र में फंसे रह जाते हैं, ईश्वर से दूर होते जाते हैं।

:-मयंक मुरारी

Thursday, 6 January 2022

आत्मग्लानि

आत्मग्लानि

            आत्मग्लानि... जी हाँ आत्मग्लानि। आप में से काफी लोग सोच रहे होंगे कि ये क्या है? तो मैं आपको बता दूं कि यह पूरा लेख पढ़ने के बाद आप खुद ही इस आत्मग्लानि का अर्थ समझ जाएंगे या हो सकता है आपमें से कुछ को इसका अनुभव भी हो जाए।हालांकि इस लेख में कुछ आपत्तिजनक शब्द और भाषा का प्रयोग हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि लेख का मुद्दा ही कुछ ऐसा है जिसकी सत्यता और परिपूर्णता के लिए इस प्रकार की लेखनी अपनानी पड़ी ताकि लेख को सचमुच में युवावर्ग के दर्पण के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
     चलिए शुरुआत करते हैं... अक्सर छात्र १६-१७ की आयु में जब स्कूली शिक्षा समाप्त कर कॉलेजों में प्रवेश करते हैं। कॉलेजों की चकाचौंध और कुछ अनचाही आधुनिकता की दौड़ में फंस जाते है। उन्हें शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण कॉलेज के आधुनिक और भोगी जीवन में बना रहना ज्यादा पसंद आता है और ऐसा करने के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं। इन्हीं शौकों में से एक है बॉयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड बनाना।जिसका वास्तविक मकसद केवल सेखी बघारना और मौज-मस्ती ही होता है। जिसमें प्रेम का कोई स्थान नहीं होता। हालांकि कुछ साल साथ बिताने और बढ़ती उम्र में हार्मोन्स के खेल से यही तथाकथित प्रेमी आगे चलकर केवल और केवल अपनी शारीरिक संतुष्टि के लिए छुप-छुपाकर सम्भोग भी कर लेते हैं। जो कि एक सभ्य समाज में निषेध है, हालांकि आज का युवा वर्ग इसे मानता तो नहीं है और कॉलेजों में बने सच्चे-झूठे प्रेमी से संभोग कर ही लेते हैं। कुछ जोड़े एक-दूसरे को बहला-फुसलाकर यह सब करते हैं तो कुछ पहले से ही एक प्रकार का करारनामा कर लेते हैं कि जब तक एक-दूसरे की शारिरिक जरूरत है तब तक हम साथ हैं वरना नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि इसी दौरान कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इसको जीवन का आदर्श प्रेम मानकर अपना तन-मन सौंपते हैं और अपने साथी को अपना जीवन सौंपने को तैयार हो जाते हैं। तो इनमें से ही कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके लिए यह सब केवल एक खेल और मौज-मस्ती होती है उन्हें किसी आदर्श और निष्ठा से कोई मतलब नहीं होता।
               अच्छा अब जब तक कॉलेज जीवन था तब तक तो यह सब ठीक लगता है इन्हें। परन्तु जैसे ही उम्र २२-२४ की होती है आगे एक लंबा जीवन, भविष्य और जिम्मेदारी दस्तक देती है। उसी वक्त ये तथाकथित प्रेमी जोड़े अपना असली रंग दिखाना शुरू करते हैं। जब बात इनके प्रेम को विवाह का रूप देने की आती है तब इनके घरवाले नहीं मानते तो कभी जात-पात आड़े आती है। कभी सफलता-विफलता तो कभी करियर। अब जो पिछले ५-६ सालों से कसमें खा रहे थे। दिन-रात साथ-साथ सो-उठ रहे थे। वो सब याद नहीं आता। अब इन्हें ये समझ क्यों नहीं आता कि उस समय भी तो हमारी जात एक नहीं थी जब हम साथ बिस्तर में थे। उस समय भी तो हमारे परिजन नहीं मानते हमारा रिश्ता। और अंततः केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कॉलेजों में शुरू की गई प्रेम कहानी या शारिरिक रिश्ते का अंत होता है। अब उस व्यक्ति के लिए तो यह सब कुछ काफी सरल था जिसने शुरू से ही इसे एक खेल माना होगा। अब चाहे वो लड़की हो या कोई लड़का। पर यह सब उस व्यक्ति के लिए एक जबरदस्त आघात की तरह होता है जिसने इसे प्रेम मानकर अपना तन और मन सौंप दिया था और संबंध या कहें की संभोग के लिए सहमति दी थी। क्योंकी एक वक्त के बाद जब बात किसी और व्यक्ति के साथ उसके विवाह की होती है तो वह अपने आप से उलझ जाता है और यही वो दौर है जहां से शुरू होती है उसे आत्मग्लानि।
                       उसे हर पल लगने लगता है की उसने जीवन में कुछ तो गलत कर दिया है। उसके जीवन में कुछ तो ऐसा था जो उसने एक गलत व्यक्ति को सौंप दिया था या उसके साथ साँझा किया था और अब वही वो दुबारा एक नए व्यक्ति के साथ फिर से साँझा नहीं कर सकता क्योंकि अब उसे उसने खो दिया है। अब वो उतनी ही निर्भीकता से यह नहीं स्वीकार कर पाता की वो अभी भी पहले की तरह ही है। जी हाँ... यहां बात की जा रही है वर्जिनिटी या यूँ कहें की लॉयल्टी की। उसे महसूस होने लगता है की अब जिस व्यक्ति के साथ उसका विवाह होने जा रहा है। जिसके साथ उसे अब अपना सम्पूर्ण जीवन निर्वाह करना है। सारे सुख-दुख का भागी होना है। असल में सिर्फ उसी व्यक्ति का मेरे तन-मन पर अधिकार होना चाहिए था जो की मैनें तो पूर्व में ही किसी और को सौंप दिया था। बहरहाल कुछ लोगों के विषय में यह केवल अपवाद है क्योंकि उनके अंतर्मन में कभी भी आत्मग्लानि नहीं उत्त्पन्न हो सकती। ऐसा इसलिए की उनका एकमात्र उद्देध्य सम्भोग होता है। अब वो किस के साथ हो रहा है और किस उम्र या अवस्था में हो रहा है। उन्हें इन सब से कोई फर्क नही पड़ता। परन्तु एक सहृदय और प्रेमी व्यक्ति के लिए उसके जीवन में यह एक बहुत महत्तवपूर्ण बात होती है। एक सच्चे प्रेमी मनुष्य के पास अपने तन-मन (जो की सबसे पवित्रम वस्तु है) के अलावा और कुछ नहीं होता अपने जीवनसाथी को उपहार स्वरूप भेंट करने को और वो उसे भी खो चुका होता है, एक ऐसे प्रेमी के लिए जिसका प्रेम से कोई दरकार ही न हो।
              हालांकि संभव है की ऐसा कुछ न भी होता हो। परन्तु संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके साथ ऐसी घटनाएं होती हैं और उनमें आत्मग्लानि  उत्त्पन्न होती है और ऐसा होनी भी चाहिए। क्योंकि पछतावा भी केवल उसी व्यक्ति को हो सकता है जिसके हृदय में ईश्वररूपी प्रेम का वास हो।

अंत में कुछ पंक्तियां:-

खाते हैं जुठन,
थाली में निवाला अपने हिस्से का जानकर।
कुछ शख्स जीते है ,
विवाह को ही सच्ची मोहोब्बत का पर्याय मानकर।

यूँ देह की चाह में
मोहोब्बतों को बदनाम न करो।
बंदिशों से खुलकर साथ दे न सको तो
यूँ बन्द कमरों में मोहोब्बतों को अंजाम न करो।

(नोट:- लेख के विषय में आपके क्या विचार है कमेंट्स में जरूर साँझा करें। किसी को लेख के विषय वस्तु या शब्दावली से कोई आपत्ति हो तो जरूर सूचित करें। यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इसका किसी व्यक्ति, वर्ग या समूह से कोई सरोकार नही है। सभी की अपनी निजी जिंदगी है जो जैसा चाहे वैसा जी सकता है।)
धन्यवाद!
                                :- संदीप प्रजापति

Tuesday, 4 January 2022

प्रतीक्षा...

प्रतीक्षा...

          प्रतीक्षा... कितना छोटा शब्द है ना ? तीन अक्षरों का यह छोटा-सा शब्द इतनी लंबी सी प्रतीक्षा को समेटे हुए है कि कभी-कभी सम्पूर्ण मानव जीवन ही कम पड़ जाए।
                 हमें जीवन में हर पल कभी न कभी किसी न किसी चीज के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस अलौकिक संसार में आने से लेकर संसार से मुक्ति पाने तक हम प्रतीक्षा में ही रहते हैं। वैसे जीवन में प्रतिक्षाओं का होना भी आवश्यक है वरना वक्त से पहले मिली चीजों का मनुष्य उचित सम्मान नहीं कर पाता। प्रतीक्षा मनुष्य को प्रत्येक वस्तु और विचार का सम्मान करना सिखाती है। प्रतीक्षा में तपकर पला व्यक्ति ही जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानकर परिपक्व हो सकता है।
            हालांकि प्रतिक्षाओं का अंत होना निश्चित होता है, परन्तु जीवन के कुछ मुद्दों जैसे कि प्रेम के मामले में कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता। प्रेम में की गई कुछ प्रतिक्षाएँ सही समय तक सफल हो जाती हैं तो कुछ प्रतिक्षाएँ जीवन उपरांत भी चलती रहती हैं और तलाशती हैं वो अपने प्रतिक्षाओं का अंत ब्रह्मांड के अनन्त छोर में। प्रेम में की गई प्रतिक्षाएँ गर एक उचित समय तक न मिल जाए तो व्यक्ति को ऐसी प्रतीक्षा से केवल अवसाद और निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलता। तो कभी-कभी अत्यधिक प्रतिक्षावान होने से केवल जूठन ही हाथ लगता है, प्रेम नहीं। खुद को निष्ठावान बनाए हुए, किसी के प्रति प्रेम पालना और प्रतीक्षा करना की वह व्यक्ति भी कभी आपके प्रेम को समझेगा। जबकि वह व्यक्ति आपके प्रेम का भागी होना स्वीकार ही नहीं कर सकता। इस प्रकार की प्रतीक्षा केवल मूर्खता हो सकती है। प्रतीक्षा का एक सही समय पर अंत हो जाना ही एक सुखद जीवन का आदर्श है। यूँ ही नहीं कहा गया है कि प्रतीक्षा में बिता एक-एक पल सदियों के बराबर होता है।
                  जिस प्रकार मेघों के बरसने से मोर की प्रतीक्षा और चन्द्रमा की चांदनी से चकोर की प्रतीक्षा का अंत होता है। उसी प्रकार मनुष्य जीवन में एक निष्ठावान प्रेमी के प्रेम पाने की प्रतीक्षा का अंत अपने प्रेमी द्वारा प्रेम पाकर ही हो सकता है।

अंत में एक पंक्ति:

अपनी सारी इच्छाओं को
मारकर अनिच्छा कर रहा हूँ,
पगली एक तेरा प्रेम पाने को
हर पल प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

                                                :- संदीप प्रजापति

(एक छोटा सा लेख हर उस प्रेमी व्यक्ति को समर्पित जो अपने जीवन का अमूल्य समय और भाव किसी व्यक्ति से निष्ठावान प्रेम पाने की प्रतीक्षा में बिता रहे है।)



Sunday, 26 December 2021

परिवार में बलात्कार

                   

परिवार में बलात्कार

            उस वक्त आप कैसा महसूस करते जब कोई आपका अपना परिचित ही आपके साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे कुकृत्य करता। जी हाँ आपने बिल्कुल सही पढ़ा। आज मैं आपको एक ऐसी ही घटना का वृत्तांत बताने जा रहा हूँ जो किसी के लिए भी जीवन को झंकझोर देनेवाला और अविस्मरणीय हो सकता है।
            हमारे भारतीय समाज में जहाँ पिता के भाई यानी चाचा को भी पिता का ही स्वरूप माना जाता है। उसी समाज में कुछ ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोग भी रहते हैं जो इस रिश्ते को भी शर्मसार करते नहीं चूकते। अपनी राक्षसी प्रवृत्ति, पशुता, चरित्रहीनता और अपने वैसिहत के कारण वे लोग भाभी-देवर और चाचा-भतीजा/भतीजी जैसे रिश्तों के मर्यादा को भी लाँघ जाते हैं। अपनी हवस और वासना में लिप्त होकर न जाने कई जिंदगियों को शारीरिक और मानसिक रूप से क्षतिग्रस्त और शर्मसार करते हैं।
        इस कहानी की शुरुआत होती है उत्तरप्रदेश के एक छोटे से गाँव से। जहाँ अनुसूचित जनजातियों के टोले का एक बेहद गरीब परिवार रहता था। परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और पाँच जीवित संतान। जिनमें से दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ। जीवित इसलिए कहा गया क्योंकि इनसे पहले कई संतानें काल के गाल में समा चुकी थीं। आजीविका का कोई प्रमुख स्रोत न होने के कारण परिवार का पालन-पोषण मुश्किल से होता था। बस किसी तरह से गुजर-बसर हो जाता। मेहनत-मजूरी करने के कारण बस जीवित भर थे। इसी तरह समय बीतता गया और परिवार का बड़ा बेटा आर्थिक परिस्थिति को भांपते हुए शहर की ओर रुख करने लगा। शिक्षित न होने के कारण शहर में कोई भी काम कर लेता। जिससे दो पैसे मिल जाते थे। खा-पहन कर जो पैसे बचते उसे वह गांव में माँ-पिताजी को भेज देता।
       यह देखकर परिवार बहुत खुश होता था। माँ-पिता को लगता कि जीवन अब सुधर सकता है। पर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। एक ओर बड़ा बेटा दिन-रात मेहनत करता दो पैसे कमाता और बचाता था तो दूसरी ओर छोटा बेटा आवारापन, नाकारा, कुलीनता और न जाने कितने-कितने दुर्गुणों में व्यस्त रहता। आए दिन कोई न कोई ओराहना लगा रहता। परिवार का संबल होना तो दूर वह तो बस नाक कटाता रहता था। बड़े बेटे की मेहतत और लगन देखकर कुछ समय बाद पिता ने उसका ब्याह रचा दिया। अब परिवार में एक और सदस्य बढ़ चुका था यानी जिम्मेदारी और अधिक हो चुकी थी। जिसके कारण उसे अपनी धर्मपत्नी को वहीं गांव में ही छोड़ शहर जाकर काम करना पड़ता। इन सब में उसका छोटा भाई बड़े भाई के न होने से घर में आयी नई बहू यानी अपनी भाभी से हंसी-ठिठोली के बहाने ही दुर्व्यवहार करता, आए दिन कहा-सुनी कर लेता तो कभी हाथ छोड़ देता। इन सबसे अधिक तो कभी स्त्री की गरिमा और मर्यादा के परे जाकर उसे अनचाहा स्पर्श कर देता। इससे तंग आकर  वह अपने पति के साथ शहर आकर रहने लगी। कुछ पल जीवन सुखमय बिता। उसे भी संतान प्राप्ति हुई। अब तक उसकी भी कुल तीन संतानें हो चुकी थीं।  और वहाँ छोटे बेटे की करतूतों से परेशान पिता ने अपने बड़े बेटे से विनती करकर कहा कि इसे भी अपने साथ रख लो। कोई काम-धंधा सिखाकर आदमी बना दो। पिता की आज्ञा को बड़ा बेटा नकार न सका। परंतु इस खबर से उसकी पत्नी जरूर अनमना गई और क्रोधित हुई।
       अब वह आवारा छोटा बेटा भी शहर में बड़े भाई के पास आ चुका था। उसकी करतूत अपनी आँखों से बड़ा भाई दररोज देखता। हालाँकि अब उसकी भाभी न तो उससे कोई मतलब ही रखती थी न ही बोलती-चालती थी। मानो की अब उनमें कोई संबंध ही न हो। शहर आकर बहुत समय हो चुका था पर अब भी वो न सुधरा था। कोई एक काम करने में न दिल लगाता और न मेहनत ही करता। हर रोज आवारागर्दी , कभी किसी से लड़ाई-झगड़ा तो कभी किसी से। अब तो उसके चलते बड़े भाई को थाना, चौकी और दरोगाओं के भी दर्शन हो चुके थे। उसके कुकृत्य इतने बढ़ चुके थे कि आस-पड़ोस की लड़कियों/महिलाओं को भी फांस लेता और अपने मंसूबे पूरे कर लेता। उसे यह सब कुछ बहुत सहज लगने लगा था। उसके इस घिनौने कारनामों की हद तो तब हो गई जब वह अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए अपने ही घर में अपने बड़े भाई के बच्चों जो कि अभी महज १०-१२ बरस के ही थे। उनके साथ भी बड़ी सहजता से दुष्कर्म करने लगा। वह उन्हें जबरदस्ती नीली-पीली सीडियों के चलचित्र दिखाता और वही कृत्य उनसे भी  हिंसात्मक होकर करवाता। न करने पर गला घोंटता तो कभी बुरी तरह पिटता। इसी तरह मार-पीट और डरा धमका कर उनका मुँह बंद रखवाता था। डर और नासमझी के कारण बच्चे भी कुछ न कह पाते और यह जघन्य अपराध और कुकर्म चुपचाप सहते रहते।और उसकी वासना का शिकार होते रहते। कुछ वर्षों बाद उस मनुष्यरूपी पशु की भी शादी हो जाती है और उसकी पत्नी भी उसके इस आचरण, दुर्व्यवहार और मानसिकता से परेशान होकर अपने ही भाग्य को कोसती रहती।

अब आपसे कुछ सवाल:

१. क्या ऐसे जघन्य अपराध करने वाले लोगों को जीने का अधिकार मिलना चाहिए?
२. क्या इन लोगों के कारण ही आज समाज से रिश्तों-नातों से भरोसा उठ रहा है?
३. इस तरह की घटनाओं से बचने और आगे समाज में ऐसी घटनाएं न हो इसके लिए आपकी क्या राय है?
४. उन बच्चों को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए था या उनकी जगह आप होते तो क्या करते।
५. क्या इस मामले में देश में कठोरतम कानून की आवश्यकता है?
६. इस तरह के पारिवारिक कुकर्म की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है, अपने विचार बताएं।

अपने विचार जरूर साँझा करें। शायद किसी की जिंदगी नरक होने से बच जाए।

(यह लेख किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए बिल्कुल नही है। यह सिर्फ कुछ विकृत मानसिकता के लोगों को केंद्रित करते हुए है न कि भारतीय रिश्ते-नातों और सम्बन्धों को शर्मसार करने या नीचा दिखाने के लिए। किसी को लेख के प्रति कोई आपत्ति हो तो जरूर साझा करें।)

Friday, 10 December 2021

शिक्षा: मजदूर की आँखों का सपना

                 शिक्षा: मजदूर की आँखों का सपना

     एक बालक मात्र १२-१३ की उम्र में बड़े शहरों का रुख करने लगा था। अभी बचपना छूटा ही न था, खेलकूद से मन भरा ही न था कि जिम्मेदारियों का बोझा सिर आ चुका था। साँवला रंग और ढीली-ढाली कद काठी का वह बालक लेकिन ईमानदारी, मेहनती और सच्चाई के गुणों को जानने वाला। निकल पड़ा था अपने गाँव-घर और माँ-बाप से दूर शहरों की ओर मजदूरी दिहाड़ी की तलाश में। जहाँ दो जून का खाना मिलता दो पैसे मिलते वहीं रह लेता मजदूरी कर लेता। कोई ढंग का काम तो मिलने से रहा, शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता जो न था। इच्छा तो थी शिक्षा पाने की परन्तु आर्थिक हालात ऐसे न थे कि वो शिक्षा पा सके। इसीलिए काम करता और जो पाता उसी में खुश रहता।
       वह कुछ वयस्क हुआ ही था कि उसका ब्याह हो गया। अब सिर पर और एक जिम्मेदारी आ गयी थी। जिम्मेदारी क्या मानो बोझ। खुद के पेट पाले नहीं पल रहे थे कि अब घर गृहस्थी भी बसाना पड़ा। देखते ही देखते अब पुत्र रूप में एक और जिम्मेदारी आ गयी थी। परंतु अब तक वह इतना साहसी तो हो चुका था कि सारी जिम्मेदारियों को निर्भीकता से उठा ले। कुछ समय बिता आर्थिक तंगी अब भी वैसी ही बनी थी परंतु अब पारिवारिक कलह भी होने लगा। मजबूरन अपना परिवार लेकर उसे माँ-पिता से अलग हमेशा के लिए किसी अनजान शहर के एक छोटी-सी झुग्गी-झोपड़ी में बसना पड़ा। जीवन की एक बिल्कुल शुरू से नई शुरुआत हुई। जस-तस गुजर बसर होने लगा। कई मौसम बदले,बरस बदलते गए अब वह तीन संतानों का पिता हो चुका था। परंतु आर्थिक तंगी बरकरार ही थी। शिक्षित न होने का मलाल जीवन भर उसे ज्यों-त्यों सताता रहता था। इसी कारण उसने अब प्रण ले लिया था कि उसे चाहे जीवन भर दुख झेलना पड़े। चाहे जो हो जाए वह अपनी संतानों को जरूर शिक्षित  करेगा। वह उन्हें पढ़ा-लिखा कर एक प्रतिष्ठित व सम्मानजनक व्यक्तित्व वाला जीवन प्रदान करेगा। यह दृढ़ संकल्प सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि उसकी पत्नी का भी था। क्योंकि वो भी धेला बराबर भी शिक्षित न थी परंतु गृहस्थी में निपुड थी और शिक्षा का महत्त्व भलीभाँति जानती थी।
               दोनों जी तोड़ अथाह मेहनत करते और उसी से अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण करते। जिंदगी की मूलभूत जरूरतों में कटौती कर अपना पेट काट-काट कर दोनों अपनी संतानों को खूब पढ़ाने का सपना संजोते। उन्होंने कुछ रो-धोकर तो कुछ सिफारिशों के सहारे अपने बच्चों को स्कूल में भर्ती तो करा दिया। पर आए दिन पढ़ाई के खर्चे और  स्कूल के शुल्क अदा कर पाना उनके बस की बात न हो पा रही थी। नतीजतन दाखला रद्द होने की नौकत तक आ गयी। न चाहते हुए भी कर्जा लदकर  बच्चों की पढ़ाई जारी रखी गई। हालाँकि बच्चे भी पढ़ाई-लिखाई में होनहार ही थे। अभावों के चलते बस जीवन के दूसरे आयामों में थोड़ा पीछे थे। मगर शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर था। आए दिन कक्षा में उनका हुनर बोलता था। शिक्षक काफी प्रभावित थे उनकी प्रतिभा से। मगर नियति पग-पग पर इनकी परीक्षा लेती और इन्हें जीवन पथ पर मजबूती से डटे रहने का सबक सिखाती।
                      वक्त के साथ-साथ दोनों दंपति उम्र दराज होते गए। मजदूरी अब किए नहीं जा रही। घरवाली अलग बीमार रहती। घर चलाना मुश्किल होता जा रहा था। परंतु व्यक्ति ने इस पल भी हार न मानी और अपना सपना जीवित रखा। किसी भी परिस्थिति में अपनी संतानों की शिक्षा को बाधित न होने दिया। चूँकि अब सन्तानें भी इतनी बड़ी हो चुकी थीं कि अपनी आर्थिक स्तिथि को समझ सकें और अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा सकें। परिणामस्वरूप उन बच्चों ने भी कुछ काम करना शुरू कर दिया और साथ ही साथ अपने पिता के सपने को भी जीवित रखा। पैसे कमाने में हाथ बंटाने के साथ साथ वे अपनी पढ़ाई को भी बखूबी जारी रखते और इतना ही नहीं सभी शैक्षणिक मापदण्डों में अव्वल ही रहते। जिससे बूढ़े दम्पत्ति को सांत्वना मिलती की ईश्वर एक न एक दिन उनकी मेहनत का फल जरूर देंगे और उनका सपना भी साकार होगा।
              यह कहानी किसी सफल व्यक्तित्व या किसी  व्यक्ति की असाधरण सफलता की नहीं है बल्कि यह कहानी हमारे देश के सबसे पिछड़े तबके के ऐसे हजारों-लाखों गरीब-मजदूर लोगों के संघर्ष की कहानी है। जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य केवल अपनी संतानों को शिक्षित कर देना ही होता है। वे इसमें ही अपने जीवन की सार्थकता को मानते हैं। और बस इसी एक संकल्प के लिए अपनी परंपरागत लीक से हटकर कुछ सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए जीवन भर जीवनभर संघर्ष करते हैं। हालाँकि उनके सपनों का सच होना न होना यह तो ईश्वर के हाथों ही है। परंतु ऐसे महान विचारधारा वाले हर उस व्यक्ति को मेरा सहृदय नमन है। ईश्वर से प्रार्थना है कि किसी ऐसे ही सपने को पूरा करने का भागीदारी मैं बन सकूँ।

एक संगिनी

एक संगिनी तुम्हारा मिलना  जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...