कविताएँ, शायरियाँ, लघुकथा, यात्रा वृत्तांत, प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक बातें और भी बहुत कुछ हिंदी में...
Sunday, 7 December 2025
एक संगिनी
Friday, 8 November 2024
प्रेम की प्रतीक्षा
Tuesday, 12 December 2023
पुरुष
Saturday, 6 May 2023
प्रेम अभिलाषा
Thursday, 26 January 2023
राम राम
Saturday, 10 December 2022
पंक्तियाँ...
Monday, 21 November 2022
तुम आना...
तुम आना...
मैं नहीं जानता तुम कहाँ हो और कब आओगी।
मगर मैं इतना जानता हूँ तुम जरूर आओगी।
और जब तुम आओगी हर वो खुशी अपने साथ लाओगी।
जिसकी प्रतीक्षा मैनें कई सालों की है।
तुम आओगी ऐसे जैसे सूखे पेडों पर पत्ते आते हैं।
जैसे सुने आसमां पर बादल छाते हैं।
जैसे बंजर खेतों में हरियाली आती है।
जैसे भोर भए उजियाला आती है।
तुम सर्द रातों की गर्माहट बनकर आना।
तुम मेरी खामोशियों की आहट बनकर आना।
तुम आना तुम आना जैसे कोई कविता की पंक्ति आती है।
तुम आना जैसे शुद्ध विचारों की संगति आती है।
तुम बरसों के युद्ध की शांति बनकर आना।
तुम जीवन में प्रेम की क्रांति बनकर आना।
तुम आना... तुम आना... सुनो तुम आना जरूर।
तुम सारी उम्मीदों को धूमिल न करना।
तुम आशाओं के सफर को नाकामयाबी की मंजिल न करना।
जो तुम न भी आओ सो लड़ाके बुजदिल न करना।
जो तुम न भी आओ सो लड़ाके बुजदिल न करना।।
:- संदीप प्रजापति
( संसार में प्रत्येक व्यक्ति को किसी की प्रतीक्षा है, और वह उसे पाने की जद में लगा है। कोई प्रेम की प्रतीक्षा में है तो कोई सफलता की। मेरी यह कविता ऐसे हर व्यक्ति को समर्पित है जो जीवन में प्रतीक्षा के दौर से गुजर रहा है और आस लगाए बैठा है कि तुम आओगी...अरी वो प्रेमिका , अरी वो सफलता तुम आओगी जरूर; अभी मैंने हिम्मत नहीं हारी है।)
Sunday, 23 October 2022
मिट्टी को जब-जब चाक धरा...
Friday, 26 August 2022
मेरी पहली किताब : एहसासों की जुबां
'एहसासों की जुबां' यह मेरी पहली ही किताब है। जिसे शाश्वत पब्लिकेशन के द्वारा प्रकाशित की गई है। मैं पूर्ण आदर और प्रेम सहित शाश्वत पब्लिकेशन परिवार का धन्यवाद करना चाहूँगा। जिन्होंने मुझे यह अवसर प्रदान किया और मेरे विचारों को सचमुच एक अमूर्त शाश्वत स्वरूप दिया।
'एहसासों की जुबां' इस किताब में मैंने संघर्ष, प्रेम, विचारों, कल्पनाओं और भावनाओं जैसे मानवीय गुणों को एकत्रित करके कुछ काव्य और पंक्तियाँ संग्रहित की हैं। जो मैं आप ईश्वर समान पाठकगण को भोग स्वरूप अर्पित करना चाहूँगा। मैं चाहूँगा की आप केवल इसके रस का आस्वादन करें और मुझ अज्ञानी से कोई भूल हुई हो तो क्षमा कर दें।
चूँकि यह मेरी पहली ही किताब है, मुझे प्रकाशन का अधिक ज्ञान और अनुभव भी न था। इसीलिए मैं चाहूँगा की कोई त्रुटि हो तो अबोध जानकर आप सभी लोग मुझे क्षमा कर देंगे और अपना प्रेम और विश्वास प्रदान करेंगे।
धन्यवाद!
आपका,
संदीप प्रजापति
Sunday, 24 July 2022
Wednesday, 13 July 2022
जब खुद से प्रेम नहीं हुआ तो दूसरों से कैसे होगा?
Sunday, 10 July 2022
प्रेम रिक्ति
Wednesday, 6 July 2022
नर से नारी तक
Sunday, 3 July 2022
इजहार...
याद आता है...
Sunday, 29 May 2022
बनारस : एक अद्भुत स्थान
Sunday, 8 May 2022
समझदारी या सूंदर नारी
Saturday, 7 May 2022
माँ
माँ
जब भी हम हिम्मत हारते हैं। उदास, हताश या निराश हो जाते हैं। जब भी लगने लगता है कि हम जीवन में असफल हो गए हैं। हम ने सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जब थक हार कर बैठ जाते हैं और लगते हैं कोसने जीवन को। तब हम अपनी अम्मा को फोन लगाते हैं। और लगते हैं रोने, जी भर के रोने। काहे से की हमें अम्मा के अलावा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं नजर आता जिसके आगे हम रो सके। मां ने कभी रोने से तो माना नही किया, पर वो जान जाती है की बात क्या है। वैसे अम्मा हमारी इसमें कर तो कुछ नहीं सकती पर जाने कौन सी हिम्मत फूँक देती है की सारी मायूसी एक आशा की किरण में बदल जाती है। लगने लगता है की अब सब ठीक हो जायेगा। अम्मा बस इतना कहती है की बबुआ मेहनत करते रहो और कभी हार न मानना जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही। उम्मीद न छोड़ना अगर किसी लायक हो जाओगे तो देर सबेर ईश्वर तुमको सफलता भी देंगे और न भी दिए तो इसका मतलब ये नही की तुम काबिल नही हो। वो कहती है की भाग्य में होगा तो सुख भी आएगा और न होगा तो कितने ही बड़े बन जाओगे तो भी सुखी न रह पाओगे। हम नही जानते की अम्मा इतनी सकारात्मकता लाती कहाँ से है, मगर हमें प्रेरणा के लिए किसी और के जीवन को ताकने की जरूरत नहीं पड़ती।
Tuesday, 26 April 2022
कुछ लिख दूँ...
कुछ लिख दूँ...
1.
कभी-कभी सोचता हूँ कि,
एक कविता बस यूँ ही लिख दूँ।
सारी की सारी तारीफें लिख दूँ,
जुल्फें आँखे होंठ गर्दन और तिल।
सब कुछ स्मृतियों में उतारू ,
और फिर तेरा रूप कागज़ पर रख दूँ।
लिख दूँ दिल की वो सारी बातें ,
जो मैं तुझसे कभी कह ही न पाया।
एक एहसास था दिल में,
जो कभी लबों तक न आया।
पहली मुलाक़ातें तेरी बातें,
मेरा इकरार तेरा इनकार लिख दूँ।
मुझ जैसे कई और हैं चाहने वाले तुम कहती थी
फिर भी लिख दूँ तुमको पहला प्यार लिख दूँ।
2.
याद है वो कोचिंग के दिन,
जब तुम मुझसे मदद लेती थी।
किसी सवाल को हल करने के बहाने,
छुपके से उन गोरे हाथों को छू लेता था।
सच कहता हूँ बस एक वो ही दिन थे,
जब मैं भी किसी को ईश्क़ कर लेता था।
है पता वो बस मतलब के दिन थे,
कुछ पल ही थे पर बेहद हसीन थे।
तुम मुझसे कुछ सवाल सीख लेती थी,
मैं तुमको देख नीत नए ख्याल लिख लेता था।
3.
कई बार खूब व्यस्त रहकर भी,
तुझको अहमियत दी थी।
बेमतलब से एक लगाव को भी,
हमने इतनी खासियत दी थी।
एक झलक तेरी देखने को,
तुझको पढ़ाना पड़ता था।
हाय रे कमबख्त ईश्क़,
नौटंकी उठाना पड़ता था।
पर अब खुशी होती है,
किसी के लिए हम भी अजीज थे।
शायद एक उम्मीद थे मीत थे
कुछ न थे पर हर मतलब में करीब थे।
(कुछ ख्यालों को यूँ ही लिख लेना चाहिए। स्मृतिपटल पर चलते कुछ रंगीन नजारों को शब्दों में पिरोकर एक कविता की माला गूंथ ईश्वर को भेंट कर देना भी भक्ति का ही स्वरूप है।)
Monday, 25 April 2022
मैंने देखा है...
एक संगिनी
एक संगिनी तुम्हारा मिलना जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...
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एक संगिनी तुम्हारा मिलना जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...
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" प्रेम मंजिल नहीं, यात्रा है। पाना नहीं, जीना है।" प्रेम में पड़ा व्यक्ति यात्री हो जाता है। एक ऐसे राह का यात्री...