कविताएँ, शायरियाँ, लघुकथा, यात्रा वृत्तांत, प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक बातें और भी बहुत कुछ हिंदी में...
Saturday, 10 December 2022
पंक्तियाँ...
Monday, 21 November 2022
तुम आना...
तुम आना...
मैं नहीं जानता तुम कहाँ हो और कब आओगी।
मगर मैं इतना जानता हूँ तुम जरूर आओगी।
और जब तुम आओगी हर वो खुशी अपने साथ लाओगी।
जिसकी प्रतीक्षा मैनें कई सालों की है।
तुम आओगी ऐसे जैसे सूखे पेडों पर पत्ते आते हैं।
जैसे सुने आसमां पर बादल छाते हैं।
जैसे बंजर खेतों में हरियाली आती है।
जैसे भोर भए उजियाला आती है।
तुम सर्द रातों की गर्माहट बनकर आना।
तुम मेरी खामोशियों की आहट बनकर आना।
तुम आना तुम आना जैसे कोई कविता की पंक्ति आती है।
तुम आना जैसे शुद्ध विचारों की संगति आती है।
तुम बरसों के युद्ध की शांति बनकर आना।
तुम जीवन में प्रेम की क्रांति बनकर आना।
तुम आना... तुम आना... सुनो तुम आना जरूर।
तुम सारी उम्मीदों को धूमिल न करना।
तुम आशाओं के सफर को नाकामयाबी की मंजिल न करना।
जो तुम न भी आओ सो लड़ाके बुजदिल न करना।
जो तुम न भी आओ सो लड़ाके बुजदिल न करना।।
:- संदीप प्रजापति
( संसार में प्रत्येक व्यक्ति को किसी की प्रतीक्षा है, और वह उसे पाने की जद में लगा है। कोई प्रेम की प्रतीक्षा में है तो कोई सफलता की। मेरी यह कविता ऐसे हर व्यक्ति को समर्पित है जो जीवन में प्रतीक्षा के दौर से गुजर रहा है और आस लगाए बैठा है कि तुम आओगी...अरी वो प्रेमिका , अरी वो सफलता तुम आओगी जरूर; अभी मैंने हिम्मत नहीं हारी है।)
Sunday, 23 October 2022
मिट्टी को जब-जब चाक धरा...
Friday, 26 August 2022
मेरी पहली किताब : एहसासों की जुबां
'एहसासों की जुबां' यह मेरी पहली ही किताब है। जिसे शाश्वत पब्लिकेशन के द्वारा प्रकाशित की गई है। मैं पूर्ण आदर और प्रेम सहित शाश्वत पब्लिकेशन परिवार का धन्यवाद करना चाहूँगा। जिन्होंने मुझे यह अवसर प्रदान किया और मेरे विचारों को सचमुच एक अमूर्त शाश्वत स्वरूप दिया।
'एहसासों की जुबां' इस किताब में मैंने संघर्ष, प्रेम, विचारों, कल्पनाओं और भावनाओं जैसे मानवीय गुणों को एकत्रित करके कुछ काव्य और पंक्तियाँ संग्रहित की हैं। जो मैं आप ईश्वर समान पाठकगण को भोग स्वरूप अर्पित करना चाहूँगा। मैं चाहूँगा की आप केवल इसके रस का आस्वादन करें और मुझ अज्ञानी से कोई भूल हुई हो तो क्षमा कर दें।
चूँकि यह मेरी पहली ही किताब है, मुझे प्रकाशन का अधिक ज्ञान और अनुभव भी न था। इसीलिए मैं चाहूँगा की कोई त्रुटि हो तो अबोध जानकर आप सभी लोग मुझे क्षमा कर देंगे और अपना प्रेम और विश्वास प्रदान करेंगे।
धन्यवाद!
आपका,
संदीप प्रजापति
Sunday, 24 July 2022
Wednesday, 13 July 2022
जब खुद से प्रेम नहीं हुआ तो दूसरों से कैसे होगा?
Sunday, 10 July 2022
प्रेम रिक्ति
Wednesday, 6 July 2022
नर से नारी तक
Sunday, 3 July 2022
इजहार...
याद आता है...
Sunday, 29 May 2022
बनारस : एक अद्भुत स्थान
Sunday, 8 May 2022
समझदारी या सूंदर नारी
Saturday, 7 May 2022
माँ
माँ
जब भी हम हिम्मत हारते हैं। उदास, हताश या निराश हो जाते हैं। जब भी लगने लगता है कि हम जीवन में असफल हो गए हैं। हम ने सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जब थक हार कर बैठ जाते हैं और लगते हैं कोसने जीवन को। तब हम अपनी अम्मा को फोन लगाते हैं। और लगते हैं रोने, जी भर के रोने। काहे से की हमें अम्मा के अलावा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं नजर आता जिसके आगे हम रो सके। मां ने कभी रोने से तो माना नही किया, पर वो जान जाती है की बात क्या है। वैसे अम्मा हमारी इसमें कर तो कुछ नहीं सकती पर जाने कौन सी हिम्मत फूँक देती है की सारी मायूसी एक आशा की किरण में बदल जाती है। लगने लगता है की अब सब ठीक हो जायेगा। अम्मा बस इतना कहती है की बबुआ मेहनत करते रहो और कभी हार न मानना जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही। उम्मीद न छोड़ना अगर किसी लायक हो जाओगे तो देर सबेर ईश्वर तुमको सफलता भी देंगे और न भी दिए तो इसका मतलब ये नही की तुम काबिल नही हो। वो कहती है की भाग्य में होगा तो सुख भी आएगा और न होगा तो कितने ही बड़े बन जाओगे तो भी सुखी न रह पाओगे। हम नही जानते की अम्मा इतनी सकारात्मकता लाती कहाँ से है, मगर हमें प्रेरणा के लिए किसी और के जीवन को ताकने की जरूरत नहीं पड़ती।
Tuesday, 26 April 2022
कुछ लिख दूँ...
कुछ लिख दूँ...
1.
कभी-कभी सोचता हूँ कि,
एक कविता बस यूँ ही लिख दूँ।
सारी की सारी तारीफें लिख दूँ,
जुल्फें आँखे होंठ गर्दन और तिल।
सब कुछ स्मृतियों में उतारू ,
और फिर तेरा रूप कागज़ पर रख दूँ।
लिख दूँ दिल की वो सारी बातें ,
जो मैं तुझसे कभी कह ही न पाया।
एक एहसास था दिल में,
जो कभी लबों तक न आया।
पहली मुलाक़ातें तेरी बातें,
मेरा इकरार तेरा इनकार लिख दूँ।
मुझ जैसे कई और हैं चाहने वाले तुम कहती थी
फिर भी लिख दूँ तुमको पहला प्यार लिख दूँ।
2.
याद है वो कोचिंग के दिन,
जब तुम मुझसे मदद लेती थी।
किसी सवाल को हल करने के बहाने,
छुपके से उन गोरे हाथों को छू लेता था।
सच कहता हूँ बस एक वो ही दिन थे,
जब मैं भी किसी को ईश्क़ कर लेता था।
है पता वो बस मतलब के दिन थे,
कुछ पल ही थे पर बेहद हसीन थे।
तुम मुझसे कुछ सवाल सीख लेती थी,
मैं तुमको देख नीत नए ख्याल लिख लेता था।
3.
कई बार खूब व्यस्त रहकर भी,
तुझको अहमियत दी थी।
बेमतलब से एक लगाव को भी,
हमने इतनी खासियत दी थी।
एक झलक तेरी देखने को,
तुझको पढ़ाना पड़ता था।
हाय रे कमबख्त ईश्क़,
नौटंकी उठाना पड़ता था।
पर अब खुशी होती है,
किसी के लिए हम भी अजीज थे।
शायद एक उम्मीद थे मीत थे
कुछ न थे पर हर मतलब में करीब थे।
(कुछ ख्यालों को यूँ ही लिख लेना चाहिए। स्मृतिपटल पर चलते कुछ रंगीन नजारों को शब्दों में पिरोकर एक कविता की माला गूंथ ईश्वर को भेंट कर देना भी भक्ति का ही स्वरूप है।)
Monday, 25 April 2022
मैंने देखा है...
Wednesday, 20 April 2022
तुम आना जरूर...
Saturday, 26 March 2022
जीवटता की ओर...
Wednesday, 23 March 2022
भाग्य
क्यों तू कोषे भाग्य को
बना कर्म को पतवार,
कूद संघर्षों के दरिया में
दे अस्तित्व को ललकार।
कितना आसान होता है न? अपनी नाकामी को भाग्य का दोष दे देना। कह देना की मैंने कोशिश बहुत की मगर यह तो मेरी किस्मत में ही नहीं था। अगर भाग्य ने साथ दिया होता तो आज मैं भी कुछ होता।
पर क्या सच में सफलता के लिए कर्मों के अलावा भाग्य का भी उतना ही महत्व है जितना कि कर्मों का है?
क्या सच में भाग्य के बिना कोई सफल या महान नहीं हो सकता? क्या एक भाग्यविहीन व्यक्ति सफल नहीं हो सकता? हाँ माना कि भाग्यशाली होना अच्छी बात है, जिससे जीवन में सफलता आसानी से प्राप्त हो सके। परन्तु मनुष्य को चाहिए की सदा भाग्य के भरोसे ही न बैठा रहे। उसे कर्मों यानी कि परिश्रम की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। भाग्य साथ दे न दे लेकिन कर्म जरूर साथ देंगे। एक कर्मविहीन व्यक्ति के सफल होने की संभावना बहुत कम ही हो सकती है, परंतु किसी कर्तव्यपरायण और कर्मठ व्यक्ति के सफल होने की सम्भावना निश्चित ही है।
Saturday, 5 March 2022
त्रिवेणी संगम : एक अविस्मरणीय यात्रा
त्रिवेणी संगम : एक अविस्मरणीय यात्रा
मैं हिंदू मेरे हिंदुत्व का परचम हो तुम।
मैं प्रयाग मेरे तीर्थराज का संगम हो तुम।।
:-संदीप प्रजापति
आज मैं आपको इन पंक्तियों के लिखने का कारण बताऊँगा,जिसको जीना अपने आप में ही गर्व है।
यों तो हम जीवनभर कई यात्राएँ करते हैं। जिनमें से कुछ पूर्वनिर्धारित होती हैं तो कुछ आकस्मिक। कुछ यात्राएँ हमें याद ही नहीं रहती तो वहीं कुछ यात्राएँ हमें जीवन भर याद रहती है और जीवन के सुंदर होने का एहसास करवाती हैं। मैं आपको एक ऐसी ही अविस्मरणीय यात्रा का वृत्तांत इस ब्लॉग के माध्यम से साँझा करने जा रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप इस ब्लॉग के माध्यम से ही इस अलौकिक स्थान के सुंदरतम दर्शन सुलभ ही कर पाएँगे।
वैसे तो समाज की मान्यता के अनुसार और सुरक्षा की दृष्टि से यात्राएँ परिजनों के साथ समूह में ही करनी चाहिए ताकि किसी भी यात्रा का आनंद दोगुना हो जाए। परंतु मेरे लिए यह केवल अपवाद मात्र है। यदि आप एकल यात्रा को चुनते हैं तो आप अत्यधिक जिम्मेदार, जागरूक, निडर और साहसी बनते हैं। साथ ही साथ आपको आपका संपूर्ण समय केवल अपने लिए अपनी इच्छानुसार जीने का मौका मिलता है तथा प्रकृति माता द्वारा अत्यधिक ज्ञान अर्जित करने का अवसर प्राप्त होता है।
तो चलिए हम अपने ब्लॉग की ओर चलते हैं। आज मैं आपको भारत के तीर्थराज यानी प्रयागराज ले चल रहा हूँ। वैसे तो पौराणिक हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह नगर अत्यधिक पवित्र और खास अहमियत रखता है। हिंदू धर्म में इस जगह का महत्व और उल्लेख मिलता है। उत्तरप्रदेश राज्य में बसा यह नगर पूरे भारत से जुड़ा हुआ है। प्रयागराज में त्रिवेणी या संगम क्षेत्र यहाँ की सबसे सुंदर जगह है। मान्यता के अनुसार यहीं पर तीन पवित्र नदियों गंगाजी, यमुनाजी और सरस्वतीजी का मिलन होता है। जिसके कारण ही इसका नाम त्रिवेणी या संगम पड़ा। यहीं पर पापनाशिनी माँ गंगा मनुष्य के पापों को नष्ट करती है।
संगम पर भक्तों और श्रद्धालुओं का तांता साल भर लगा रहता है। लेकिन कुछ प्रमुख त्योहारों और कुम्भ मेलों पर यहाँ होने वाली भीड़ का कोई सानी नहीं। प्रत्येक १२ वर्ष में यहाँ पर महाकुम्भ मेले का आयोजन होता है। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ष माघ मेले का भी आयोजन होता है। जिसमें श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं। इस वर्ष माघ मेले में मैंने भी संगम आने का निश्चय किया और गंगा मईया की कृपा से उनके दर्शन भी हुए। प्रयागराज में जैसे ही आप शास्त्री ब्रिज से संगम का विहंगम दृश्य देखते हैं एक क्षण के लिए खुद को पृथ्वी का सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति समझने का गौरव होना कोई अचरज नहीं। लाखों की संख्या में मनुष्यों का जमावड़ा, न जाने कितने सारे छोटे छोटे अस्थायी झोपडें, साधु-संत-महात्मा, भक्तिमय वातावरण, आरती-पूजा, शंखनाद, भजन इत्यादि आपको अपनी ओर आकर्षित करेंगे ही।
संगम को जी भर जीने के लिए आपको कम से कम एक दिन-रात की आवश्यकता पड़ती है और एक स्थाई जगह जहाँ आप ठहर सकें। संगम पहुँचते ही मैं सबसे पहले बड़े हनुमान मंदिर, लेटे हुए हनुमान मंदिर और श्री आदि शंकर विमान मण्डपम मंदिरों में ईश्वर के दर्शन के लिए गया। जिससे मुझे ईश्वर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री आदि शंकर मण्डपम की रचना शैली, भव्यता और सुंदरता ने तो मन ही मोह लिया था। और तो और इस मंदिर के ऊपरी मंजिले से पूरे संगम का अलौकिक दृश्य देखना किसी स्वप्न से कम नहीं। दूर दूर तक जगमगाती लाईटें, ब्रिज, गंगा मईया, भक्तिमय वातावरण, ठंडी हवाएं, इलाहाबाद फोर्ट और तिरंगा। आहा...।
मंदिरों के दर्शन के बाद मैं वहाँ से निकलकर गंगा जी के दर्शन, आरती और स्नान के लिए गया। संगम की बलुई मिट्टी, गंगा जी की कलकल की ध्वनि, घाटों की सुंदरता और नाव, पानी में तैरते दीप, गंगाजल के डिब्बे, इत्यादि मन को आल्हादित कर देते हैं। गंगा जी के दर्शन कर मैं गंगा आरती का साक्षी बना। फिर मैंने गंगा जी में स्नान कर जाने-अनजाने हुए पापों के लिए क्षमा याचना की और सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इतनी ठंड रात में गंगा जी में स्नान करना आसान तो नहीं पर जहाँ श्रद्धा,आस्था और भक्ति हो वहाँ कुछ मुश्किल नहीं होता। चारों तरफ भक्ति का वातावरण, हर कोई धार्मिक कर्मकांड करते हुए नजर आना, अपने परिचितों का अंतिम संस्कार, मुंडन, इत्यादि कितना कुछ देखने और सिखने को मिला। शायद किसी अच्छे कर्म के कारण ही इन सब का साक्षी होने का मौका मुझे मिला। सारे धार्मिक कर्म करने के पश्चात कुछ देर शांति से गंगाजी के पास बैठना परम् सुख की अनुभूति करवाता है।
इसके बाद मैंने मेले की ओर रुख किया। मेले की रौनक देखते ही बनती थी। तरह तरह की धार्मिक और घरेलू वस्तुएं , पहनने-ओढ़ने की चीजें, खाद्यपदार्थों के स्टाल कितना कुछ था। हालांकि मुझे मेले में अत्यधिक रुचि नहीं सो मैं वहाँ से निकल गया। अरे हाँ, मैं तो 'नमामि गंगे' और 'रामायण जी' के ऐतिहासिक प्रदर्शनी के बारे में बताना ही भूल गया। यहाँ पर आयोजित प्रदर्शनी जिसमें 'नमामि गंगे प्रोजेक्ट' और 'रामायण जी' को बहुत ही सुंदर और वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत किया गया था इस प्रकार की प्रदर्शनी का आयोजन करना युवा वर्ग को भारत से रूबरू करवाने के लिए आवश्यक है।
संगम से ब्रिज को देखते ही कुछ पंक्तियां याद आने लगती है:
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।
तू किसी रेल-सी गुजरती है
मैं किसी पूल-सा थरथराता हूँ।
और हाँ सुना है कि संगम दो बार आना चाहिए। तो देखते हैं दुबारा कब बुलावा आता है।
संगम में इतना कुछ है कि जिसको लिखना मेरे बस का नहीं। इसीलिए कहूंगा कि संगम को अनुभव करना होगा और जीना होगा।
अंत में उन मित्रों का सहृदय धन्यवाद जिन्होंने अपने पास ठहरने की उचित व्यवस्था प्रदान की और स्वनिर्मित स्वादिष्ट भोजन से आतिथ्य किया। उनके आतिथ्य का सदा ऋणी रहूंगा।
(नोट:- सभी से एक आग्रह है। यदि आपको धर्म में आस्था न हो तो भी एक बार इस प्रकार की जगह पर जरूर जाएं। इस तरह की जगहों का संबंध केवल धर्म से जोड़ना उचित नहीं। इन जगहों पर जीवन जीने की कला का दर्शन होता है। जिससे आप अपने जीवन को एक नई दिशा दे पाएंगे।)
Friday, 25 February 2022
युद्ध या प्रेम : कौन श्रेष्ठ
Monday, 24 January 2022
अयोध्या जी : श्रीरामजन्म भूमि
अयोध्या जी... कितना सुंदर और अलौकिक है ना यह नाम? नाम मात्र से ही जीवन में एक आशा दौड़ जाती है। हिंदू धर्म में आध्यात्मिकता का एक प्रमुख केंद्र, तीर्थ स्थल, सर्व पूरियों में विशिष्टता रखती यह 'अयोध्या पूरी' कई सालों से हिंदुओं के आस्था का केंद्र बनी हुई है। अनेकों बार बसने-उजड़ने की कहानी संजोए, कई आक्रमण झेले हुए आज भी यह नगरी अपनी प्राचीनता और भव्यता सहित विराजमान है। जिसके कण-कण में प्रभु 'श्रीराम' बसते हैं। सालों से विवादों में घिरे होने के बावजूद यह नगरी और नगरवासी आज भी 'रामराज्य' की संकल्पना में जीते हैं। अवध क्षेत्र में रहते प्रत्येक नगरवासी के मुख से आज के युग में भी चारों पहर 'राम नाम' ही सुनने को मिलना राम जी के प्रति उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का ही परिणाम है।
इस नगरी के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व को देखते हुए देश-विदेश से लाखों दर्शनार्थी और पर्यटक यहाँ आते हैं और जीवन से जुड़े रहस्यों को भी समझने की कोशिश करते हैं। क्योंकि जीवन की व्याख्या धर्म से बेहतर शायद कहीं और नहीं मिल सकती। तो आइए आज हम भी चलते हैं 'अयोध्या जी'। अयोध्या जी यह भारत के उत्तरप्रदेश राज्य में बसी नगरी है। जो की यातायात के सभी साधनों से जुड़ी हुई है, जिसके कारण आप भारत के किसी भी हिस्से से यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। यहाँ आने की यात्रा भी अपने आप में उल्लासपूर्ण होती है। एक बार अयोध्या नगरी में पहुंचने के बाद आपको चारों तरफ साधु-महात्मा और पंडितों का तांता लगा हुआ दिखेगा। जिनमें से कुछ पंडित तो केवल लुटेरों के भांति ही होते हैं। और हाँ यहीं से शुरू होती है आपके अयोध्या दर्शन की यात्रा। आप यहाँ से कई आकर्षक घाटों, मंदिरों, धार्मिक स्थलों के दर्शन कर सकते हैं।
मान्यता के अनुसार अयोध्याजी में प्रवेश करते ही आपको सबसे पहले हनुमान गढ़ी में हनुमान जी के दर्शन करने चाहिए और उनकी आज्ञा से अयोध्या नगरी और रामजन्मभूमि क्षेत्र व रामलला के दर्शन करने चाहिए। तो आइए हम चलते हैं हनुमान गढ़ी मंदिर। यह मंदिर एक टीले पर बसा है। मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए लगभग ७६ सीढ़ियों को चढ़ना होता है, जिससे हनुमान जी के भव्य दर्शन प्राप्त हो सकें। मंदिर के प्रांगण से हनुमान जी की प्रतिमा के अलौकिक दर्शन होना बेहद सुखद अनुभव होता है। यह मंदिर मानसिक शांति और आध्यात्मिकता का केंद्र है। इसके बाद हम क्रमशः कनक भवन, दशरथ महल, सीताजी की रसोई, इत्यादि के भी दर्शन कर सकते हैं और इन महलों, भवनों की भव्यता को देखकर आनंद का अनुभव करते हैं। यहाँ के इन महलों, भवनों और मंदिरों की स्थापत्य कला भी अपने आप में काफी अद्भुत है।
अब हम चलते हैं रामलला के दर्शन करने जिसकी शुरुआत होती है रामजन्मभूमि क्षेत्र से। जहाँ जाने के लिए आपको घंटों कतार में लगना होगा और सुरक्षा कारणों से आपकी सभी वस्तुएं जमा करानी होगी। रामलला के जयकारे की गूंज के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में आप जन्मभूमि क्षेत्र तक पहुंचते हैं। जहाँ आपको भव्य मंदिर निर्माण के कार्यों, नींव स्थल, आकर्षक स्तंभों, खंभों इत्यादि के दर्शन होते हैं। हालांकि भव्य मंदिर निर्माण कार्य अभी चल ही रहा है, जिससे आपको मंदिर के दर्शन नहीं होते। कुछ आगे बढ़ने पर आपको रामलला की प्रतिमा के दर्शन होंगे जिसकी स्थापना राममंदिर में होगी। रामलला की प्रतिमा के दर्शन करना ही जैसे त्रेता के साक्षात राम के दर्शन हो जाने के स्वरूप है। राम जी के दर्शन से सुख-शांति और आनंद की प्राप्ति होने के पश्चात आप अयोध्या जी में बसे अनेकों घाटों और सरजू मईया के दर्शन के लिए जा सकते हैं।
घाटों में सुप्रसिद्ध नयाघाट, अयोध्या जी के प्रमुख घाटों में से एक है। यहाँ घाट पर स्नान-ध्यान, मुंडन, अंतिम-संस्कार, इत्यादि धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं। घाट से ही आप सरजू मईया के पावन जल में स्नान कर अपने आप को दोष मुक्त करने का प्रण ले सकते हैं। पर्यटन की भावना से आए हुए लोगों के लिए यहाँ नौकाविहार एक अच्छा विकल्प हो सकता है। नौकाविहार से आप सरयू नदी के मध्य में जाकर अयोध्या नगरी में बसे घाटों के विहंगम दृश्य को देख सकते हैं, इन्हीं घाटों पर नित आरती होती है। जिसका साक्षी होने के लिए प्रत्येक दर्शनार्थी इच्छुक होता है। घाटों की इस शृंखला में झुनकी घाट, तुलसी घाट, राजघाट, इत्यादि भी प्रमुख हैं।
घाटों की पूजा-अर्चना और धार्मिक कर्मकांडों का अनुभव करने के पश्चात आप 'राम की पैड़ी' जा सकते हैं। कहते हैं अयोध्या जी आए और 'राम की पैड़ी' न देखा, तो आपने कुछ न देखा। 'राम की पैड़ी' पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया गया एक बहुत ही सुंदर स्थल है। जहाँ जल की धारा के एक ओर भव्य एवं प्राचीन इमारत और मंदिर स्थित हैं तो दूसरी ओर पर्यटकों के लिए सूंदर पार्क, उद्यान इत्यादि है। पिछले कुछ वर्षों से इसी 'राम की पैड़ी' पर विश्व प्रसिद्ध भव्य "दीपोत्सव" का भी आयोजन किया जाता है। 'राम की पैड़ी' की सुंदरता को देखते हुए यहाँ कुछ हद तक छात्र-छात्राएं और प्रेमी युगल भी समय बिताने के लिए आते रहते हैं। यहाँ आस-पास में कुछ स्टॉल और छोटे-छोटे फेरीवाले पर्यटकों की जरूरतों के उपयुक्त सामान बेचते हुए देखे जा सकते हैं। पर्यटन के विषय हेतु अयोध्याजी में 'राम की पैड़ी' सबसे सुंदरतम स्थान है। हालांकि संपूर्ण अयोध्या जी का धार्मिक महत्त्व तो है ही। साथ ही साथ पर्यटन का भी महत्व है। इन सब के अलावा अयोध्या जी में प्राचीन घरों को देखना भी अद्भुत है। जिनकी अवस्था अब बिल्कुल जीर्ण हो चुकी है। इनमें से कुछ तो खंडहर की भांति प्रतीत होते हैं। यूँ तो अयोध्या जी का वर्णन करने को तो शब्द ही कम पड़ जाए और लेख समाप्त ही न हो। परन्तु इस लेख की लंबाई आवश्यकता से अधिक न हो जाए इसलिए लेख को यहीं समाप्त करना पड़ रहा है।
तो कैसी लगी आपको यह अयोध्या जी के दर्शन की यात्रा। आशा करता हूँ कि इस लेख के माध्यम से आपको भी अयोध्या नगरी, रामलला, राम की पैड़ी और अनेकों घाटों के दर्शन का अनुभव और रस प्राप्त हुआ होगा। अपने विचार और अनुभव कमेंट्स में साँझा करें। प्रभु श्रीराम सबका मंगल करें।
जय श्रीराम🚩
एक संगिनी
एक संगिनी तुम्हारा मिलना जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...
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एक संगिनी तुम्हारा मिलना जीवन को एक नई आस देता है, घोर अंधेरे में विहंगम उजला कोई प्रकाश देता है। तुम तब आई जब युद्ध मैं हार चुका था, निराश...
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मिट्टी को जब-जब चाक धरा... मिट्टी को जब-जब चाक धरा, रच बर्तन में आकार गढ़ा, बर्तन मिट्टी से बचा धरा, क्यों मैं कुम...